मुन्ना भाई एमबीबीएस एक मास्टरस्ट्रोक जिसने शाहरुख खान के इनकार के बाद संजय दत्त की किस्मत बदल दी

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मुन्ना भाई एमबीबीएस और शाहरुख खान

साल 2003 का वह दौर था जब भारतीय सिनेमा में एक्शन और रूमानियत का बोलबाला था और दर्शक एक ही तरह की कहानियां देखकर ऊबने लगे थे। इसी बीच एक नए और अनजान निर्देशक राजकुमार हिरानी एक ऐसी कहानी लेकर आए जो पारंपरिक सिनेमाई सांचे से बिल्कुल अलग थी। यह कहानी थी एक ऐसे स्थानीय गुंडे की जो डॉक्टर बनने का सपना देखता है और जिसका इलाज कड़वी दवाइयों से नहीं बल्कि मानवीय भावनाओं से होता है।

शुरुआत में जब विधु विनोद चोपड़ा के प्रोडक्शन हाउस में यह स्क्रिप्ट पहली बार पढ़ी गई तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने वाली है। यह फिल्म सिर्फ एक कॉमेडी ड्रामा नहीं थी बल्कि यह एक ऐसे सफर की शुरुआत थी जिसने समाज को जादू की झप्पी का नया और खूबसूरत फलसफा दिया। इस फिल्म ने सिनेमाघरों में जो तालियां बटोरीं उसकी गूंज आज दो दशक बाद भी दर्शकों के दिलों में बिल्कुल ताजी है।

यह कहानी सिर्फ एक फिल्म के बनने की नहीं है बल्कि यह उस अप्रत्याशित चमत्कार की है जिसने एक विवादित सुपरस्टार को नई पहचान दी और एक डूबते हुए करियर को संजीवनी प्रदान की। विधु विनोद चोपड़ा की बहुचर्चित किताब अनस्क्रिप्टेड में इस बात का विस्तार से जिक्र किया गया है कि कैसे मुन्ना भाई का यह ऐतिहासिक रोल पहले बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान के पास गया था। यह जानना बेहद दिलचस्प है कि किंग खान के एक दुर्भाग्यपूर्ण इंकार ने किस तरह संजय दत्त के लिए एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक तैयार किया जिसकी मिसाल आज भी सिनेमा जगत में दी जाती है।

किंग खान की वह ना जिसने बदल दिया सिनेमा का इतिहास

राजकुमार हिरानी और विधु विनोद चोपड़ा की पहली पसंद मुन्ना के इस अनोखे किरदार के लिए शाहरुख खान ही थे और वे इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित भी नजर आ रहे थे। शाहरुख खान को यह कहानी और इसका भावनात्मक पहलू बहुत पसंद आया था और उन्होंने फिल्म में काम करने के लिए तुरंत अपनी सैद्धांतिक सहमति भी दे दी थी। शाहरुख के जुड़ने के बाद फिल्म का प्री-प्रोडक्शन बहुत तेजी से शुरू हो गया था और पूरी टीम इस प्रोजेक्ट को लेकर बेहद सकारात्मक थी।

शाहरुख खान ने मुन्ना के किरदार के लिए अपनी खास तैयारी भी शुरू कर दी थी और वे इस अनूठे कॉमिक अवतार में पर्दे पर आने के लिए पूरी तरह से तैयार थे। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था क्योंकि उसी दौरान शाहरुख खान को अपनी पीठ और रीढ़ की हड्डी में गंभीर दर्द की शिकायत होने लगी। यह शारीरिक दर्द इतना बढ़ गया कि उन्हें तत्काल सर्जरी कराने के लिए लंदन जाना पड़ा और इस वजह से उनके सभी बड़े प्रोजेक्ट्स की तारीखें अनिश्चित काल के लिए आगे खिसक गईं।

शाहरुख खान अपनी कार्यशैली को लेकर हमेशा से बहुत पेशेवर रहे हैं और वे नहीं चाहते थे कि उनकी बीमारी की वजह से राजकुमार हिरानी की पहली फिल्म में कोई बेवजह देरी हो। इसलिए उन्होंने बेहद भारी मन से इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट से खुद को पूरी तरह से अलग करने का एक कड़ा फैसला किया। शाहरुख का यह अचानक लिया गया फैसला उस समय फिल्म निर्माताओं के लिए एक बहुत बड़ा झटका था क्योंकि वे इस महत्वाकांक्षी फिल्म को एक स्थापित और बड़े स्टार के साथ ही शुरू करना चाहते थे।

जहीर के रोल से मुन्ना भाई बनने तक का दिलचस्प सफर

शाहरुख खान के फिल्म छोड़ने के बाद निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अब इस चुनौतीपूर्ण किरदार को कौन सा अभिनेता पर्दे पर जीवंत करेगा। इसी बीच संजय दत्त को फिल्म में जहीर नाम के उस कैंसर मरीज के छोटे से रोल के लिए चुना गया था जिसे बाद में जिमी शेरगिल ने बेहद खूबसूरती से निभाया था। संजय दत्त ने विधु विनोद चोपड़ा के साथ अपने गहरे पारिवारिक संबंधों के कारण बिना पूरी स्क्रिप्ट सुने ही उस छोटे से रोल के लिए अपनी हामी भर दी थी।

निर्माताओं ने मुन्ना के मुख्य किरदार के लिए उस समय के उभरते हुए सितारे विवेक ओबेरॉय से भी संपर्क किया था जो उस वक्त इंडस्ट्री में काफी लोकप्रिय हो रहे थे। लेकिन तारीखों की कमी और कुछ अन्य रचनात्मक मतभेदों के कारण विवेक ओबेरॉय के साथ बात नहीं बन पाई और फिल्म एक बार फिर मुख्य अभिनेता के बिना अधर में लटक गई। इसी निराशा के बीच एक दिन विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी की नजर संजय दत्त की उस असल जिंदगी की शख्सियत पर पड़ी जो बाहर से सख्त लेकिन अंदर से बेहद नर्म थी।

उन्हें अचानक यह अहसास हुआ कि मुन्ना भाई का जो अक्खड़पन और मासूमियत स्क्रिप्ट में लिखी गई है वह संजय दत्त के व्यक्तित्व से बिल्कुल मेल खाती है। जब संजय दत्त को यह बताया गया कि अब वे फिल्म में जहीर का छोटा रोल नहीं बल्कि मुन्ना भाई का मुख्य किरदार निभा रहे हैं तो वे खुद भी काफी हैरान रह गए थे। उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि यह अचानक हुआ बदलाव उनके पूरे फिल्मी करियर की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक छलांग साबित होने वाला है।

अनस्क्रिप्टेड के पन्नों से खुले विधु विनोद चोपड़ा के राज

विधु विनोद चोपड़ा की किताब अनस्क्रिप्टेड में इस फिल्म के निर्माण से जुड़े कई ऐसे राज खोले गए हैं जो आम दर्शकों की नजरों से हमेशा दूर रहे। इस किताब में बताया गया है कि राजकुमार हिरानी जैसे नए निर्देशक पर पैसा लगाने के लिए शुरुआत में कोई भी फाइनेंसर आसानी से तैयार नहीं हो रहा था। इंडस्ट्री के कई दिग्गज लोगों का मानना था कि एक गुंडे और मेडिकल कॉलेज की यह अटपटी कहानी बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हो जाएगी।

किताब में इस बात का भी विस्तार से उल्लेख है कि कैसे विधु विनोद चोपड़ा ने तमाम चेतावनियों के बावजूद राजकुमार हिरानी की इस अनूठी दृष्टि पर अपना पूरा भरोसा जताया। उन्होंने ठान लिया था कि चाहे जो भी हो वह इस फिल्म को उसी रूप में बनाएंगे जैसा हिरानी ने अपने दिमाग में सोचा है और इसके लिए उन्होंने हर संभव जोखिम उठाया। संजय दत्त के चयन को लेकर भी इंडस्ट्री में कई तरह की शंकाएं थीं क्योंकि उस समय उनकी छवि एक एक्शन हीरो की थी जो कॉमेडी फिल्मों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती थी।

किताब के पन्नों से यह भी पता चलता है कि स्क्रिप्ट के कई दृश्यों को संजय दत्त के स्वाभाविक अंदाज के अनुसार फिल्म के सेट पर ही थोड़ा बहुत बदला गया था। राजकुमार हिरानी ने संजय दत्त को इस किरदार में ढलने के लिए पूरी स्वतंत्रता दी जिसके परिणामस्वरूप मुन्ना का किरदार इतना वास्तविक और जमीन से जुड़ा हुआ नजर आया। यह विधु विनोद चोपड़ा का वह अटूट विश्वास ही था जिसने सभी शंकाओं को दरकिनार करते हुए एक ऐसी फिल्म को जन्म दिया जो आज भी सिनेमाई पाठ्यक्रम का अहम हिस्सा है।

संजू बाबा के जीवन का सबसे कठिन दौर और उनकी वापसी

मुन्ना भाई एमबीबीएस का निर्माण उस समय हो रहा था जब संजय दत्त अपने निजी जीवन और कानूनी पचड़ों के कारण बेहद तनावपूर्ण और मुश्किल दौर से गुजर रहे थे। उन्हें बार-बार अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे थे और मीडिया में उनकी छवि एक खलनायक और बिगड़ैल इंसान के रूप में लगातार पेश की जा रही थी। इस भारी मानसिक दबाव के बीच किसी भी अभिनेता के लिए एक हल्की-फुल्की और भावनात्मक कॉमेडी फिल्म पर ध्यान केंद्रित करना लगभग असंभव काम था।

लेकिन संजय दत्त ने इस फिल्म को सिर्फ एक काम की तरह नहीं बल्कि अपने भीतर की भड़ास और दर्द को बाहर निकालने के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। मुन्ना भाई के किरदार में जो एक अजीब सी खामोशी और गहरी करुणा नजर आती है वह कहीं न कहीं संजय दत्त के अपने जीवन के संघर्षों का ही सीधा प्रतिबिंब थी। पर्दे पर दूसरों का दर्द दूर करने वाला मुन्ना असल जिंदगी में अपने खुद के सुकून और शांति की तलाश में दर-दर भटक रहा था।

जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो इसने रातों-रात संजय दत्त की उस नकारात्मक और डार्क छवि को पूरी तरह से धो कर रख दिया जिसे मिटाने में सालों लग जाते। दर्शक अब उन्हें एक खूंखार गैंगस्टर की नजर से नहीं बल्कि एक प्यारे और मासूम भाई की नजर से देखने लगे थे जो किसी को भी गले लगाकर उसका दुख दूर कर सकता है। यह सिर्फ एक बॉक्स ऑफिस वापसी नहीं थी बल्कि यह एक अभिनेता के तौर पर संजय दत्त का वह सामाजिक पुनर्जन्म था जिसने उन्हें जनता का सबसे चहेता सितारा बना दिया।

फिल्म निर्माण के दौरान पर्दे के पीछे की कुछ खास बातें

  • मुन्ना भाई के पिता का किरदार निभाने के लिए सुनील दत्त को राजी करना सबसे मुश्किल काम था क्योंकि उन्होंने लगभग एक दशक से कैमरे का सामना नहीं किया था
  • सर्किट के मशहूर किरदार के लिए पहले मकरंद देशपांडे को चुना गया था लेकिन बाद में यह रोल अरशद वारसी की झोली में आ गिरा जिसने उनका करियर संवार दिया
  • इस फिल्म के अधिकांश अस्पताल वाले दृश्य किसी महंगे स्टूडियो में नहीं बल्कि पुणे के एक असली और चालू मेडिकल कॉलेज में बेहद कम संसाधनों के साथ शूट किए गए थे
  • जादू की झप्पी का विचार राजकुमार हिरानी को अपने निजी जीवन के एक वाकये से आया था जिसे उन्होंने बेहद सादगी से फिल्म की मुख्य आत्मा में पिरो दिया
  • फिल्म का मशहूर गाना एम बोले तो असल में फिल्म की शूटिंग पूरी होने के काफी बाद शूट किया गया था ताकि फिल्म को एक मजबूत और आकर्षक प्रोमोशनल गाना मिल सके

पिता और पुत्र के रिश्ते की वह अनकही भावनात्मक कहानी

इस फिल्म का सबसे मजबूत और दिल को छू लेने वाला पहलू सुनील दत्त और संजय दत्त का एक साथ पहली और आखिरी बार रूपहले पर्दे पर नजर आना था। सुनील दत्त राजनीति और समाज सेवा में इतने व्यस्त हो चुके थे कि उन्होंने अभिनय की दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था और वापसी का उनका कोई विचार नहीं था। लेकिन विधु विनोद चोपड़ा के लगातार आग्रह और अपने बेटे संजय दत्त के साथ काम करने की एक अनकही इच्छा ने उन्हें अंततः इस फिल्म के लिए राजी कर लिया।

फिल्म के सेट पर पिता और पुत्र के बीच के दृश्य इतने वास्तविक और गहरे होते थे कि कई बार पूरी शूटिंग यूनिट की आंखें सचमुच नम हो जाती थीं। खासकर वह दृश्य जहां मुन्ना का सच सामने आने के बाद उसके पिता उसे स्टेशन पर छोड़कर जाते हैं उस दृश्य में संजय दत्त के आंसू किसी ग्लिसरीन के मोहताज नहीं थे। वह असल जिंदगी का वह पश्चाताप था जो एक बेटे की आंखों से अपने पिता के सामने बह रहा था और कैमरे ने उस दर्द को पूरी शिद्दत के साथ कैद कर लिया।

सुनील दत्त के लिए भी अपने बेटे को एक ऐसे इंसान के रूप में देखना जो अपनी गलतियों को सुधारना चाहता है एक बेहद भावुक और व्यक्तिगत अनुभव था। फिल्म के अंत में जब मुन्ना अपने पिता के गले लगता है तो वह सिर्फ एक सिनेमाई जादू की झप्पी नहीं थी बल्कि वह दत्त परिवार के सालों पुराने दर्द का असली मरहम थी। इस फिल्म के रिलीज होने के कुछ समय बाद ही सुनील दत्त का निधन हो गया जिससे यह फिल्म संजय दत्त के लिए हमेशा के लिए एक अनमोल और पवित्र स्मृति बन गई।

सर्किट और मुन्ना की वह दोस्ती जो सिनेमा की मिसाल बन गई

मुन्ना भाई की कहानी तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक उसमें उसके सबसे वफादार और जान छिड़कने वाले दोस्त सर्किट का अहम जिक्र न किया जाए। अरशद वारसी उस समय अपने करियर के सबसे निचले और संघर्षपूर्ण दौर से गुजर रहे थे और उनके पास उस वक्त काम का भारी टोटा था। जब उन्हें सर्किट का यह रोल मिला तो उन्होंने इसे अपने जीवन के आखिरी बड़े अवसर की तरह लिया और इस किरदार में अपनी पूरी जान और ऊर्जा झोंक दी।

संजय दत्त और अरशद वारसी के बीच की जो ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री उभर कर सामने आई वह भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बेहतरीन जुगलबंदियों में से एक मानी जाती है। सर्किट का वह ठेठ मुंबईया अंदाज और मुन्ना भाई के प्रति उसका अंधा समर्पण दर्शकों को इतना पसंद आया कि लोग इस जोड़ी के दीवाने हो गए। इन दोनों ने मिलकर दोस्ती की एक ऐसी नई और बेमिसाल परिभाषा गढ़ी जिसने जय-वीरू की तरह ही भारतीय जनमानस में अपनी एक स्थायी और अमिट जगह बना ली।

एक फिल्म जिसने जादू की झप्पी को राष्ट्रीय मंत्र बना दिया

मुन्ना भाई एमबीबीएस सिर्फ एक व्यावसायिक हिट फिल्म नहीं थी बल्कि यह भारतीय समाज में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक सांस्कृतिक बदलाव लेकर आई थी। इस फिल्म ने मेडिकल पेशे की उन कठोर और भावनाहीन वास्तविकताओं पर एक बहुत ही मीठा लेकिन गहरा और तीखा प्रहार किया था जो अक्सर मरीजों को इंसान नहीं बल्कि सिर्फ एक केस मानते हैं। फिल्म का यह संदेश कि प्यार और सहानुभूति से बड़ी से बड़ी बीमारी से भी लड़ा जा सकता है हर आम हिंदुस्तानी के दिल में सीधे तौर पर उतर गया।

फिल्म में इस्तेमाल किया गया शब्द जादू की झप्पी रातों-रात एक राष्ट्रीय और लोकप्रिय मंत्र बन गया जिसका इस्तेमाल लोग अपने रोजमर्रा के तनाव और दुखों को दूर करने के लिए करने लगे। स्कूल के बच्चों से लेकर दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों तक हर कोई मुन्ना भाई की भाषा और उसके खास अंदाज की नकल करने लगा था। इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि अगर इसे सही नीयत से बनाया जाए तो यह समाज में खुशियां बांटने का सबसे ताकतवर जरिया बन सकता है।

जब एक किरदार अभिनेता की आत्मा में हमेशा के लिए बस जाए

सिनेमा के लंबे और सुनहरे इतिहास में ऐसे बहुत कम मौके आते हैं जब कोई किरदार उसे निभाने वाले अभिनेता की असली पहचान पर पूरी तरह से हावी हो जाता है। मुन्ना भाई के साथ संजय दत्त का जो आत्मीय और गहरा रिश्ता बना वह किसी भी स्क्रिप्ट या निर्देशन की सीमाओं से बहुत परे था। आज इतने सालों बाद भी जब संजय दत्त सड़क पर निकलते हैं तो लोग उन्हें उनके असली नाम से कम और मुन्ना भाई के नाम से ज्यादा पुकारना पसंद करते हैं।

शाहरुख खान का वह इंकार अगर उस दिन न हुआ होता तो शायद आज बॉलीवुड के पास मुन्ना भाई के रूप में यह अनमोल और बेशकीमती नगीना कभी नहीं होता। विधु विनोद चोपड़ा की अनस्क्रिप्टेड किताब हमें इसी बात का अहसास कराती है कि कई बार हमारे जीवन की सबसे बड़ी सफलताएं उन रास्तों पर मिलती हैं जो मूल रूप से हमारे लिए बने ही नहीं थे। मुन्ना भाई एमबीबीएस एक ऐसी सदाबहार और कालजयी फिल्म है जो हर दौर में प्रासंगिक रहेगी और दर्शकों को हंसाते हुए जिंदगी के सबसे गहरे सबक सिखाती रहेगी।

Sanket Kala

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