‘पंचायत’ का सचिव जी असल जिंदगी में आईआईटी पासआउट जितेंद्र कुमार को इस रोल ने कैसे वापस इंजीनियरिंग के दिनों में धकेल दिया

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Jitendra Kumar Panchayat

साल था 2008 जब राजस्थान के खैरथल जैसे एक छोटे से कस्बे का लड़का देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी खड़गपुर के गलियारों में कदम रखता है। उसकी आंखों में सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर एक सुरक्षित भविष्य बनाने का सपना था लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। उस नौजवान के भीतर एक कलाकार जन्म ले रहा था जो किताबों के पन्नों से ज्यादा कॉलेज के नाटकों और हिंदी ड्रामैटिक्स सोसाइटी में दिलचस्पी रखता था।

यह कहानी सिर्फ एक आम लड़के के स्टार बनने की नहीं है बल्कि यह एक ऐसे सफर की दास्तान है जहां असल जिंदगी और रील लाइफ के बीच का फासला पूरी तरह मिट जाता है। टीवीएफ की मशहूर वेब सीरीज ‘पंचायत‘ में अभिषेक त्रिपाठी का किरदार निभाते हुए जितेंद्र कुमार ने ना सिर्फ एक पंचायत सचिव को जिया बल्कि वो मानसिक रूप से अपने उन्हीं संघर्ष के दिनों में लौट गए जब वो खुद एक इंजीनियर के तौर पर अपने भविष्य की तलाश में थे। इस आर्टिकल में हम उसी अनकहे सफर की गहराइयों में उतरेंगे और जानेंगे कि कैसे एक इंजीनियर का अधूरा सपना फुलेरा गांव के धूल भरे रास्तों पर जाकर मुकम्मल हुआ।

सपनों के शहर में संघर्ष और सर्वाइवल की वो अनकही कहानी

आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद जब जितेंद्र ने मुंबई का रुख किया तो राहें उतनी आसान नहीं थीं जितनी दूर से नजर आती थीं। सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री होने के बावजूद उनका दिल एक्टिंग में ही रमता था लेकिन मायानगरी में सिर्फ टैलेंट के दम पर पेट नहीं भरा जा सकता। उन्होंने अपने खर्च चलाने के लिए वही रास्ता चुना जो एक इंजीनियर के लिए सबसे मुफीद होता है यानी कोचिंग क्लासेस में बच्चों को फिजिक्स पढ़ाना।

दिन में एक्टिंग के ऑडिशन देना और शाम को बच्चों को गुरुत्वाकर्षण और न्यूटन के नियम समझाना उनकी दिनचर्या का एक अहम हिस्सा बन गया था। यह वो दौर था जब डिजिटल क्रांति बस भारत में दस्तक दे ही रही थी और द वायरल फीवर यानी टीवीएफ अपने शुरुआती चरण में था। जितेंद्र अपने कॉलेज के सीनियर बिस्वपति सरकार के संपर्क में आए और यहीं से उनके यूट्यूब के उस ऐतिहासिक सफर का आगाज हुआ जिसने आगे चलकर इतिहास रचना था।

टेक कन्वर्सेशन्स विद डैड और मुन्ना जज्बाती जैसे छोटे लेकिन बेहद प्रभावशाली किरदारों से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू कर दी थी। स्क्रीन पर उनकी वो घबराहट और स्वाभाविक एक्टिंग लोगों को बहुत असली लगने लगी थी क्योंकि वो कैमरे के सामने अभिनय नहीं करते थे बल्कि अपनी जिंदगी के अनुभवों को ही पर्दे पर जी रहे होते थे। पिचर्स में जतिन का किरदार हो या कोटा फैक्ट्री का जीतू भैया उन्होंने हर रोल में अपने इंजीनियरिंग के दिनों की छाप छोड़ी।

फुलेरा गांव का वो ‘सचिव जी’ जिसने रातों-रात बदल दी किस्मत की लकीर

जितेंद्र के करियर में असली भूचाल तब आया जब उन्हें टीवीएफ की मास्टरपीस सीरीज पंचायत में अभिषेक त्रिपाठी के रोल के लिए मुख्य अभिनेता के तौर पर कास्ट किया गया। इस सीरीज के निर्माण के दौरान जब वो पहली बार सेट पर पहुंचे तो उन्हें लगा जैसे वो किसी टाइम मशीन में बैठकर वापस अपने पुराने दिनों में आ गए हों। अभिषेक त्रिपाठी भी एक ऐसा इंजीनियर है जो अपनी नौकरी से नाखुश है और कैट की परीक्षा पास करके एक बेहतर जिंदगी की तलाश में गांव की धूल फांक रहा है।

जितेंद्र के लिए यह सिर्फ एक किरदार नहीं था बल्कि यह उनका खुद का अक्स था जो सालों बाद पर्दे पर उतर रहा था। पंचायत की मेकिंग वीडियो में खुद मेकर्स ने बताया है कि कैसे जितेंद्र ने सेट के माहौल को अपनी पुरानी यादों से जोड़ लिया था। मेकिंग के दौरान जितेंद्र ने महसूस किया कि अभिषेक की हताशा और शहर की चकाचौंध से दूर गांव की उस नीरस जिंदगी का अहसास बिल्कुल वैसा ही है जैसा एक संघर्षरत इंजीनियर अपने शुरुआती दिनों में महसूस करता है।

लौकी की सब्जी से लेकर गांव की छोटी-छोटी राजनीति और प्रहलाद चाचा के तानों तक हर चीज ने उन्हें उनके उसी फ्रस्ट्रेशन की याद दिला दी जो उन्होंने कभी अपने करियर की शुरुआत में झेली थी। वो एक ऐसा दौर था जब जितेंद्र को लगने लगा था कि शायद वो अभिषेक त्रिपाठी को नहीं निभा रहे बल्कि अभिषेक त्रिपाठी उनके अंदर मौजूद उस पुराने जितेंद्र को बाहर निकाल रहा है जो सालों पहले मुंबई की भीड़ में कहीं खो गया था।

किरदार और असल जिंदगी के बीच की वो पतली लकीर जो पूरी तरह मिट गई

जब अभिषेक त्रिपाठी रात के अंधेरे में इमरजेंसी लाइट जलाकर कैट की तैयारी करता है तो जितेंद्र के चेहरे पर दिखने वाली वो थकान कोई साधारण एक्टिंग नहीं थी। वो उन रातों की सच्ची यादें थीं जब जितेंद्र खुद इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ऐसी ही रातों में जागा करते थे और भविष्य की चिंताओं में खोए रहते थे। गांव की उस भयंकर गर्मी और बिजली कटौती के बीच अपनी महत्वाकांक्षाओं को जिंदा रखना एक ऐसी चुनौती थी जिसे जितेंद्र ने अपनी नसों में महसूस किया था।

आईआईटी की वो पढ़ाई और उसके बाद की वो बेचैनी उन्हें इस किरदार की गहराइयों तक ले गई जहां शब्दों की जरूरत खत्म हो जाती है। जब स्क्रीन पर सचिव जी झल्लाते हुए अपने दोस्त को फोन पर गालियां देते हैं तो वो हर उस भारतीय युवा की आवाज बन जाती है जो अपने कॉरपोरेट या सरकारी जॉब के प्रेशर में पिस रहा है। जितेंद्र ने अपने इंजीनियरिंग बैकग्राउंड का पूरा इस्तेमाल इस किरदार के उस मानसिक तनाव को दर्शाने में किया जो आज के हर महत्वाकांक्षी युवा की कहानी है।

पर्दे के पीछे की चुनौतियां और वो विवाद जिनका करना पड़ा सामना

जैसे-जैसे जितेंद्र सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए उनके सामने नई चुनौतियां भी मुंह बाए खड़ी हो गईं जो एक स्टार की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा होती हैं। एक पूरी सीरीज को अपने कंधों पर अकेले खींचने का दबाव बहुत बड़ा था क्योंकि इससे पहले वो अक्सर एन्सेम्बल कास्ट का हिस्सा हुआ करते थे। पंचायत की सफलता ने उन्हें रातों-रात एक ऐसा स्टार बना दिया जिससे दर्शकों की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ गई थीं।

पंचायत के दूसरे सीजन के बाद इंडस्ट्री के गलियारों में कुछ ऐसी खबरें उड़ने लगीं कि जितेंद्र और टीवीएफ के बीच कुछ अनबन चल रही है और शायद वो तीसरे सीजन का हिस्सा ना हों। इन अफवाहों ने फैंस के बीच भारी हलचल मचा दी थी लेकिन जितेंद्र ने बहुत ही ग्रेसफुल तरीके से खामोशी से काम लिया और इन खबरों को कभी तूल नहीं दिया। अंततः जब वो तीसरे सीजन में नजर आए तो उन्होंने बिना कुछ कहे ही सारे आलोचकों के मुंह बंद कर दिए।

इसके अलावा उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को एक ही सांचे में ढलने से रोकने की थी जो बॉलीवुड की सबसे पुरानी बीमारी है। एक ‘मिडिल क्लास लड़के’ की छवि उनके ऊपर इस कदर हावी हो गई थी कि हर निर्माता उन्हें उसी तरह के रोल ऑफर करने लगा था। एक अभिनेता के तौर पर इस छवि को तोड़ना और अपनी बहुमुखी प्रतिभा को साबित करना उनके लिए किसी चक्रव्यूह को भेदने से कम नहीं था लेकिन उन्होंने अपने धैर्य से इसका भी सामना किया।

‘पंचायत’ की मेकिंग और सचिव जी के सफर के पांच अनसुने किस्से

जितेंद्र कुमार के इस सफर और पंचायत की पर्दे के पीछे की कहानी में कई ऐसे राज छिपे हैं जो आम दर्शकों की नजरों से दूर रहे हैं। आइए उन खास बातों पर एक नजर डालते हैं जो इस सीरीज को और भी खास बनाती हैं

  • असल गांव की तलाश के लिए टीवीएफ की टीम ने मध्य प्रदेश के सैकड़ों गांवों का दौरा किया था और जितेंद्र खुद उस लोकेशन को देखकर हैरान थे क्योंकि वो बिल्कुल उनके दिमाग में बसे एक बचपन के गांव की तरह था
  • सीरीज में सचिव जी के कमरे में रखी किताबें सिर्फ प्रॉप नहीं थीं बल्कि वो असली किताबें थीं जिन्हें देखकर जितेंद्र को अपनी पढ़ाई के दिनों की याद आती थी और वो अक्सर शॉट के बीच उनके पन्ने पलटने लगते थे
  • प्रधान जी और प्रहलाद चाचा के साथ उनकी केमिस्ट्री इसलिए इतनी असली लगती है क्योंकि सेट पर कट बोलने के बाद भी वो लोग उसी किरदार के लहजे में आपस में घंटों तक पंचायत किया करते थे
  • कैट की परीक्षा को लेकर सचिव जी का जो फ्रस्ट्रेशन पर्दे पर दिखता है उसे परफेक्ट बनाने के लिए जितेंद्र ने अपने उन आईआईटी के दोस्तों से लंबी बातचीत की थी जो खुद इस परीक्षा की तैयारी कर चुके थे
  • सीरीज के मशहूर पानी की टंकी वाले सीन को शूट करते वक्त जितेंद्र सच में ऊंचाई से घबरा रहे थे और उनका वो असली डर कैमरे पर बिल्कुल सटीक भावनाओं के रूप में हमेशा के लिए रिकॉर्ड हो गया

भारतीय ओटीटी जगत में जितेंद्र कुमार की विरासत और उनका गहरा प्रभाव

जितेंद्र कुमार ने भारतीय मनोरंजन उद्योग में एक नए युग की शुरुआत की है जहां हीरो को सिक्स पैक एब्स या विदेशी कारों की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक आम शक्ल-सूरत वाला इंसान जिसकी परेशानियां बिल्कुल हमारी और आपकी तरह हैं वो भी लाखों दिलों की धड़कन बन सकता है। उनका सचिव जी का किरदार एक पूरा कल्चरल फेनोमेनन बन चुका है जिसने भारतीय युवाओं को एक बहुत ही मजबूत आवाज दी है।

आम आदमी के सुपरस्टार की उपाधि

उनकी इस सफलता ने उन हजारों अभिनेताओं के लिए दरवाजे खोल दिए हैं जो छोटे शहरों से आते हैं और खुद को बॉलीवुड के स्थापित सांचों में फिट नहीं पाते। जितेंद्र की विरासत इसी बात में निहित है कि उन्होंने आम आदमी की कहानी को उस मुकाम पर पहुंचा दिया जहां बड़े-बड़े सितारे भी ओटीटी पर अपनी किस्मत आजमाने को मजबूर हो गए। आज सचिव जी सिर्फ एक काल्पनिक किरदार नहीं बल्कि एक ऐसा प्रतीक बन गए हैं जो हर उस युवा का प्रतिनिधित्व करता है जो सिस्टम से लड़ते हुए अपने बड़े सपने पूरे करना चाहता है।

जब तक गांव में एक भी पानी की टंकी है वो एक इंजीनियर ही रहेगा

जितेंद्र कुमार का यह खूबसूरत सफर इस बात का जीता जागता सबूत है कि हमारी जड़ें हमें कभी नहीं छोड़तीं चाहे हम जिंदगी में कितनी भी दूर क्यों ना चले जाएं। एक आईआईटी इंजीनियर से लेकर एक संघर्षरत एक्टर और फिर पूरे देश के चहेते सचिव जी तक का यह सफर एक पूरा जीवन चक्र है जो हर किसी को प्रेरित करता है। उन्होंने अपनी कला और मेहनत से यह दिखा दिया कि इंसान के असली अनुभव ही उसके अभिनय को अमर बनाते हैं।

फुलेरा गांव की वो धूल भरी हवाएं और वो लौकी के खेत हमेशा इस बात की गवाही देंगे कि एक बेहतरीन कलाकार ने अपने अतीत को किस तरह अपने वर्तमान का सबसे मजबूत हथियार बनाया। जब भी कोई थका हुआ युवा अपने दफ्तर की डेस्क पर बैठकर अपने अधूरे सपनों के बारे में सोचेगा तो उसे सचिव जी का वो उदास लेकिन संघर्षशील चेहरा जरूर याद आएगा। जितेंद्र ने अपने इस सफर से साबित कर दिया है कि जीवन की सबसे अच्छी कहानियां वही होती हैं जिनमें इंसान खुद अपना अक्स देख सके।

Sanket Kala

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