रामगढ़ का वो खौफनाक साया जो पहले केवल कागजों पर था
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे होते हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते बल्कि और भी गहरे हो जाते हैं। 1970 के दशक की शुरुआत का वो दौर था जब मुंबई के एक छोटे से कमरे में दो युवा लेखक अपनी टाइपराइटर पर कुछ ऐसा रच रहे थे जो आने वाले दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाला था। सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी एक ऐसी कहानी बुन रही थी जिसमें नायक से ज्यादा जोर एक खलनायक पर था। यह खलनायक कोई सूट-बूट पहनने वाला शहर का डॉन नहीं था बल्कि चंबल के बीहड़ों की धूल में सना हुआ एक खूंखार डाकू था।
गब्बर सिंह का किरदार असल जिंदगी के एक डाकू से प्रेरित था जिसने 1950 के दशक में ग्वालियर के आसपास आतंक मचा रखा था। सलीम-जावेद ने इस किरदार को इतनी बारीकी से लिखा था कि उसकी हंसी से लेकर उसके जूतों की आवाज तक में खौफ महसूस होता था। यह केवल एक फिल्म का विलेन नहीं था बल्कि एक ऐसा शैतान था जिससे लोग अपने बच्चों को डराने वाले थे। लेकिन इस खौफनाक चेहरे को पर्दे पर जीवंत कौन करेगा यह सवाल उस समय पूरे बॉलीवुड में गूंज रहा था।
इस कहानी का महत्व केवल एक फिल्म के बनने तक सीमित नहीं है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे सिनेमा की दुनिया में एक छोटी सी ना किसी दूसरे इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा हां बन सकती है। अनुपमा चोपड़ा की किताब ‘शोले: द मेकिंग ऑफ ए क्लासिक’ के पन्नों से निकली यह दास्तान हमें उस सफर पर ले जाती है जहां हम देखेंगे कि कैसे किस्मत के खेल ने भारतीय सिनेमा को उसका सबसे महान खलनायक दिया और कैसे एक गुमनाम अभिनेता रातों-रात किंवदंती बन गया।
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रमेश सिप्पी की पहली पसंद डैनी डेंजोंगपा और वो अफगानी सफर
जब ‘शोले‘ की कास्टिंग शुरू हुई तो निर्देशक रमेश सिप्पी के दिमाग में गब्बर सिंह के लिए एक ही नाम था और वो नाम था डैनी डेंजोंगपा। उस समय डैनी बॉलीवुड में अपने खास लुक और बेहतरीन अभिनय के कारण तेजी से उभर रहे थे। उनकी आंखें उनकी शारीरिक बनावट और उनकी आवाज में वो तीखापन था जो गब्बर सिंह के किरदार के लिए बिल्कुल सटीक बैठता था। रमेश सिप्पी ने डैनी को कहानी सुनाई और डैनी इस खूंखार किरदार को निभाने के लिए तुरंत तैयार भी हो गए।
सब कुछ तय हो चुका था और डैनी ने गब्बर सिंह के रूप में अपनी तैयारियां भी शुरू कर दी थीं। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। उसी दौरान डैनी ने फिरोज खान की महत्वकांक्षी फिल्म ‘धर्मात्मा’ भी साइन कर रखी थी। ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग अफगानिस्तान के दुर्गम इलाकों में होनी थी और इसके लिए एक लंबा और कड़ा शेड्यूल तय किया गया था। फिरोज खान अपने प्रोजेक्ट्स को लेकर बहुत सख्त थे और उन्होंने साफ कर दिया था कि उन्हें डैनी की पूरी तारीखें चाहिए।
इधर ‘शोले’ का सेट बेंगलुरु के पास रामगढ़ में बनकर तैयार हो रहा था। रमेश सिप्पी को भी ठीक उन्हीं तारीखों में डैनी की जरूरत थी जिन तारीखों में डैनी को अफगानिस्तान जाना था। डैनी एक भयंकर दुविधा में फंस गए थे। एक तरफ रमेश सिप्पी की ‘शोले’ थी जो एक बहुत बड़ी फिल्म बनने जा रही थी और दूसरी तरफ फिरोज खान की ‘धर्मात्मा’ थी जिसके लिए डैनी पहले ही जुबान दे चुके थे।
फिरोज खान का वो उसूल जिसने बदल दिया भारतीय सिनेमा का इतिहास
डैनी ने बहुत कोशिश की कि दोनों फिल्मों की तारीखों में कुछ तालमेल बिठाया जा सके। उन्होंने फिरोज खान से भी बात की और रमेश सिप्पी से भी विनती की। लेकिन दोनों ही फिल्में इतने बड़े पैमाने पर बन रही थीं कि किसी भी निर्देशक के लिए अपनी शूटिंग को आगे-पीछे करना संभव नहीं था। फिरोज खान ने डैनी से स्पष्ट कह दिया कि उन्हें अपने वादे पर कायम रहना होगा। डैनी जो अपने उसूलों के पक्के थे उन्होंने भारी मन से ‘शोले’ को छोड़ने का फैसला कर लिया।
यह एक ऐसा फैसला था जिसने उस समय रमेश सिप्पी की रातों की नींद उड़ा दी थी। फिल्म की शूटिंग शुरू होने वाली थी और उनका मुख्य खलनायक फिल्म से बाहर हो चुका था। डैनी का ‘शोले’ छोड़ना उस समय एक बहुत बड़ी खबर बन गई थी। रमेश सिप्पी और उनकी टीम फिर से उसी बिंदु पर आ खड़े हुए जहां से उन्होंने शुरुआत की थी। अब उन्हें एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो डैनी की कमी को पूरा कर सके और गब्बर के खौफ को पर्दे पर उतार सके।
एक नए चेहरे की तलाश और सलीम खान की वो पुरानी याद
पूरी टीम एक नए गब्बर की तलाश में जुट गई। संजीव कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गजों के सामने टिकने वाला कोई साधारण अभिनेता नहीं हो सकता था। तभी सलीम खान के दिमाग में एक पुरानी याद कौंधी। उन्होंने कुछ साल पहले दिल्ली में एक नाटक देखा था जिसमें मशहूर अभिनेता जयंत के बेटे अमजद खान ने एक बहुत ही दमदार भूमिका निभाई थी। उस नाटक में अमजद की ऊर्जा और उनका रौब सलीम खान के जहन में छप गया था।
सलीम खान ने रमेश सिप्पी को अमजद खान का नाम सुझाया। उस समय अमजद खान बॉलीवुड के लिए एक नया और अनजान चेहरा थे। उन्होंने कुछ छोटी-मोटी भूमिकाएं जरूर की थीं लेकिन कोई बड़ा ब्रेक उन्हें नहीं मिला था। जब अमजद खान को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया गया तो वे काफी घबराए हुए थे। उनका वजन थोड़ा ज्यादा था और उनकी चाल में एक अजीब सा भारीपन था जो गब्बर के किरदार के लिए एक अनोखी खूबी बन सकता था।
अमजद खान ने खुद को साबित करने के लिए जी-जान लगा दी। अनुपमा चोपड़ा की किताब में जिक्र है कि गब्बर के किरदार की गहराई को समझने के लिए अमजद खान ने जया बच्चन के पिता तरुण कुमार भादुड़ी द्वारा लिखी गई किताब ‘अभिशाप’ पढ़ी थी। यह किताब चंबल के डाकुओं के जीवन पर आधारित थी। अमजद ने इस किताब से डाकुओं की भाषा उनके हाव-भाव और उनके सोचने के तरीके को आत्मसात किया।
आवाज का वो विवाद जिसने अमजद खान की रातों की नींद उड़ा दी
स्क्रीन टेस्ट के बाद रमेश सिप्पी ने अमजद खान को गब्बर सिंह के रूप में चुन लिया। रामगढ़ के सेट पर शूटिंग शुरू हो गई। अमजद खान ने पुरानी सेना की वर्दी पहनी कमर में कारतूसों की पेटी बांधी और अपने चेहरे पर वो खौफनाक मुस्कान ओढ़ ली। लेकिन शूटिंग के कुछ ही दिनों बाद एक नया और गंभीर विवाद खड़ा हो गया।
जब फिल्म के कुछ शुरुआती दृश्य देखे गए तो फिल्म की टीम के कुछ सदस्यों को अमजद खान की आवाज में दम नहीं लगा। उस जमाने में प्राण और प्रेमनाथ जैसे खलनायकों की आवाजें बहुत भारी और गरजदार हुआ करती थीं। अमजद खान की आवाज थोड़ी पतली थी और कुछ लोगों का मानना था कि यह आवाज एक खूंखार डाकू के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। यहां तक कि लेखक जावेद अख्तर ने भी रमेश सिप्पी से अमजद खान को बदलने की बात कह दी थी।
यह खबर किसी तरह अमजद खान तक पहुंच गई। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस फिल्म को वे अपने करियर का सबसे बड़ा मौका मान रहे थे वो उनके हाथों से फिसलती हुई नजर आ रही थी। अमजद खान रातों को सो नहीं पाते थे और सेट पर हमेशा तनाव में रहते थे। उन्हें डर था कि किसी भी दिन उन्हें वापस मुंबई भेज दिया जाएगा। लेकिन इस नाजुक मोड़ पर रमेश सिप्पी ने एक निर्देशक के तौर पर अपनी दूरदर्शिता दिखाई। उन्होंने सभी की बातों को दरकिनार करते हुए अमजद खान की उसी पतली लेकिन डरावनी आवाज पर भरोसा जताने का फैसला किया।
पर्दे के पीछे की कुछ अनसुनी और रोचक बातें
गब्बर सिंह का किरदार जितना पर्दे पर खौफनाक था उसके बनने की कहानी उतनी ही दिलचस्प रही है। आइए ‘शोले’ और गब्बर सिंह से जुड़ी कुछ ऐसी ही अनसुनी बातों पर नजर डालते हैं
- गब्बर सिंह के डायलॉग्स इतने मशहूर हुए कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में पहली बार किसी विलेन के डायलॉग्स के ऑडियो कैसेट अलग से बाजार में बेचे गए और वे रातों-रात ब्लॉकबस्टर साबित हुए
- अमजद खान की वह मशहूर चाल जिसमें वे पत्थरों पर अपने जूतों की आवाज करते हुए चलते हैं वह दरअसल उनके अपने भारी वजन और नर्वसनेस के कारण स्वाभाविक रूप से पैदा हुई थी जिसे रमेश सिप्पी ने फिल्म में जस का तस रखा
- फिल्म में साम्भा का किरदार निभाने वाले मैक मोहन का पूरे तीन घंटे की फिल्म में केवल एक ही डायलॉग था पूरे पचास हजार लेकिन इस एक लाइन ने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया
- गब्बर सिंह की लोकप्रियता का आलम यह था कि ब्रिटानिया ग्लूकोज डी बिस्कुट ने अपने विज्ञापन के लिए अमजद खान को गब्बर के ही रूप में साइन किया था जो उस समय किसी भी खलनायक के लिए एक अभूतपूर्व बात थी
- शुरुआत में गब्बर के रोल के लिए संजीव कुमार और अमिताभ बच्चन दोनों ने ही दिलचस्पी दिखाई थी लेकिन रमेश सिप्पी चाहते थे कि ये दोनों अभिनेता फिल्म के नायक ही बने रहें
एक ऐसी विरासत जिसे सिनेमा का कोई भी विलेन मिटा नहीं सका
जब 15 अगस्त 1975 को ‘शोले’ रिलीज हुई तो शुरुआती कुछ दिनों तक फिल्म को ठंडी प्रतिक्रिया मिली। समीक्षकों ने इसे एक असफल प्रयोग करार दिया और अमजद खान की आवाज को लेकर वही पुरानी आलोचनाएं फिर से दोहराई जाने लगीं। लेकिन दूसरे हफ्ते से जैसे कोई चमत्कार हो गया। दर्शकों के बीच गब्बर सिंह के डायलॉग्स आग की तरह फैलने लगे। कितने आदमी थे और जो डर गया समझो मर गया जैसे संवाद हर गली-मोहल्ले में गूंजने लगे।
अमजद खान जो कुछ हफ्तों पहले तक एक अनजान अभिनेता थे वे अचानक पूरे देश के सबसे बड़े स्टार बन गए। उनकी पतली आवाज जो कभी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही थी वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। उस आवाज में जो सनक और जो खौफ था उसने भारतीय सिनेमा में खलनायक की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। अब विलेन केवल एक बुरा इंसान नहीं था बल्कि वह फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका था।
डैनी डेंजोंगपा ने बाद में कई इंटरव्यूज में माना कि उन्हें ‘शोले’ छोड़ने का कभी अफसोस नहीं हुआ क्योंकि उस समय उन्होंने अपने उसूलों को चुना था। लेकिन उन्होंने यह भी खुशी-खुशी स्वीकार किया कि अमजद खान ने गब्बर सिंह के रूप में जो जादू किया वह शायद वे खुद भी कभी नहीं कर पाते। गब्बर सिंह का किरदार अमजद खान के लिए उनकी नियति बन चुका था।
जब खलनायक ही फिल्म का सबसे बड़ा नायक बन गया
सिनेमा का इतिहास हमेशा उन कहानियों को याद रखता है जो उम्मीदों के विपरीत जाकर एक नया मुकाम हासिल करती हैं। गब्बर सिंह के निर्माण की यह दास्तान हमें यही सिखाती है कि कभी-कभी किसी इंसान की कमियां ही उसकी सबसे बड़ी खूबी बन जाती हैं। अगर अमजद खान की आवाज भारी होती तो शायद गब्बर सिंह उतना खौफनाक नहीं लगता। अगर उनकी चाल में वो अजीब सा लड़खड़ाहट नहीं होता तो शायद गब्बर का वो पागलपन पर्दे पर कभी उभर कर सामने नहीं आता।
अमजद खान ने अपनी पूरी जिंदगी में सैकड़ों फिल्में कीं और कई बेहतरीन किरदार निभाए लेकिन गब्बर सिंह की परछाई उनके साथ हमेशा रही। यह एक ऐसा किरदार था जिसने अपने समय के सबसे बड़े नायकों को भी पर्दे पर बौना साबित कर दिया था। गब्बर सिंह केवल एक भूमिका नहीं थी बल्कि वह एक ऐसा तूफान था जिसने बॉलीवुड की पुरानी परंपराओं को जड़ से उखाड़ फेंका और एक ऐसी लकीर खींच दी जिसे आज तक कोई दूसरा अभिनेता पार नहीं कर सका है।







