स्टारडम बनाम टैलेंट की वह अनसुनी जंग जब प्रतीक गांधी के लिए हंसल मेहता ने बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को कर दिया था नामंजूर

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Scam 1992 Untold Story Hansal Mehta and Pratik Gandhi

भारतीय ओटीटी के इतिहास को अगर दो हिस्सों में बांटा जाए तो वह ‘स्कैम 1992’ के पहले और ‘स्कैम 1992‘ के बाद का दौर कहलाएगा। इस एक सीरीज ने सिर्फ दर्शकों का नजरिया ही नहीं बदला बल्कि मनोरंजन जगत की पूरी परिभाषा को ही एक नया रूप दे दिया।

हर्षद मेहता की कहानी को पर्दे पर उतारना कोई आसान काम नहीं था क्योंकि यह सिर्फ एक वित्तीय घोटाले की कहानी नहीं थी बल्कि एक आम आदमी के आसमान छूने और फिर वहां से गिरने की दास्तान थी। लेकिन इस मास्टरपीस के बनने से पहले पर्दे के पीछे जो जंग लड़ी गई वह किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं थी।

यह कहानी है स्टारडम बनाम टैलेंट की जिसमें एक निर्देशक ने अपने विजन के लिए पूरी इंडस्ट्री के स्थापित नियमों से बगावत कर दी।

इस खास रिपोर्ट में हम उसी अनसुनी कहानी के पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे कि कैसे हंसल मेहता ने एक ऐसे अभिनेता के लिए बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का रिजेक्शन झेला जिसे उस वक्त हिंदी पट्टी में कोई नहीं जानता था।

यह कहानी सिर्फ एक वेब सीरीज के बनने की नहीं है बल्कि यह उस संघर्ष की है जहां एक क्रिएटिव दिमाग को कॉर्पोरेट दुनिया के एक्सेल शीट्स और स्टार वैल्यू के दबाव से लड़ना पड़ता है। यह जानना हर उस दर्शक के लिए जरूरी है जो सिनेमा को सिर्फ चमक धमक नहीं बल्कि एक सच्ची कला मानता है।

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सफलता के पैमाने और ओटीटी की वह भूल भुलैया

साल दो हजार अट्ठारह और उन्नीस का वह दौर जब भारतीय ओटीटी बाजार धीरे धीरे अपने पैर पसार रहा था। यह वह समय था जब हर प्लेटफॉर्म किसी बड़े बॉलीवुड चेहरे की तलाश में था ताकि दर्शकों को अपनी ओर खींचा जा सके।

सेक्रेड गेम्स जैसी सीरीज ने यह साबित कर दिया था कि बड़े स्टार्स डिजिटल दुनिया में दर्शकों को खींचने का सबसे सुरक्षित दांव हैं। इसके बाद तो जैसे होड़ मच गई और हर बड़ा प्रोडक्शन हाउस बॉलीवुड के ए लिस्ट सितारों को ओटीटी पर लाने की जुगत में लग गया।

प्लेटफॉर्म्स के अधिकारी अपने वातानुकूलित बोर्डरूम में बैठकर स्क्रिप्ट से ज्यादा इस बात पर चर्चा करते थे कि पोस्टर पर किस बड़े अभिनेता का चेहरा लगाया जाएगा। ऐसे में किसी नए या कम पहचाने जाने वाले चेहरे को लीड रोल में कास्ट करना एक बहुत बड़ा जोखिम माना जाता था।

हंसल मेहता जो अपनी यथार्थवादी फिल्मों जैसे शाहिद और अलीगढ़ के लिए जाने जाते थे वह एक नई चुनौती के लिए तैयार थे। देबाशीष बसु और सुचेता दलाल की किताब ‘द स्कैम’ पर आधारित इस कहानी को उन्होंने एक महाकाव्य की तरह पर्दे पर उतारने का सपना देखा था।

हंसल मेहता का विजन बहुत साफ था और वह इस कहानी को किसी टिपिकल बॉलीवुड मसाले की तरह नहीं बल्कि एक सच्ची और जमीनी कहानी की तरह पेश करना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने इस प्रोजेक्ट को लेकर अलग अलग प्लेटफॉर्म्स के दरवाजे खटखटाए तो उन्हें एक ऐसी हकीकत का सामना करना पड़ा जो कला की आत्मा को कुचलने वाली थी।

वह एक जिद जिसने खोजी दलाल स्ट्रीट की सबसे असली आवाज

हंसल मेहता एक ऐसे हर्षद मेहता की तलाश में थे जो दिखने में आम गुजराती इंसान लगे लेकिन उसकी आंखों में एक ऐसा जुनून हो जो पूरे सिस्टम को हिला सके। उन्हें कोई ऐसा सुपरस्टार नहीं चाहिए था जिसका अपना स्टारडम और अपनी इमेज किरदार पर हावी हो जाए।

हर्षद मेहता का किरदार ऐसा था जिसे दर्शकों से सहानुभूति भी चाहिए थी और उनके मन में एक खौफ भी पैदा करना था। उनकी इस तलाश का अंत हुआ गुजराती थिएटर और सिनेमा के एक जाने माने नाम प्रतीक गांधी पर जिन्हें हंसल ने पहले काम करते हुए देखा था।

प्रतीक के पास वह गुजराती लहजा वह ठहराव और वह शारीरिक भाषा थी जो हर्षद के किरदार के लिए एकदम सटीक बैठती थी। हंसल मेहता ने जब प्रतीक को मंच पर देखा तो उन्हें लगा कि जैसे साक्षात हर्षद मेहता उनके सामने खड़ा है।

जब हंसल मेहता ने प्रतीक गांधी को इस रोल के लिए फाइनल किया तो उन्हें लगा कि उन्होंने अपना आधा युद्ध जीत लिया है। लेकिन असली लड़ाई तो अभी शुरू होने वाली थी क्योंकि जिन प्लेटफॉर्म्स को यह सीरीज खरीदनी थी उनके लिए प्रतीक गांधी कोई बड़ा नाम नहीं थे।

हंसल ने प्रतीक को बुलाया और उनसे कहा कि वह इस रोल के लिए तैयारी शुरू कर दें लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि रास्ता बहुत मुश्किल है। प्रतीक गांधी जो उस समय तक अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे उनके लिए यह एक जीवन बदलने वाला अवसर था।

रिजेक्शन का वह दौर जब बड़े प्लेटफॉर्म्स ने मोड़ा मुंह

एक के बाद एक बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के साथ मीटिंग्स का दौर शुरू हुआ और हर बार हंसल मेहता को एक ही घिसा पिटा जवाब मिलता था। अधिकारियों का कहना था कि कहानी बहुत शानदार है स्क्रिप्ट में दम है लेकिन लीड रोल में कोई बड़ा बॉलीवुड स्टार होना चाहिए।

मार्केटिंग और पीआर की टीमों का तर्क था कि बिना किसी बड़े चेहरे के वे इस सीरीज को प्रमोट कैसे करेंगे और मुंबई की सड़कों पर बड़े होर्डिंग्स पर किसका चेहरा लगाएंगे। कुछ प्लेटफॉर्म्स ने तो यहां तक कह दिया कि अगर वह किसी बड़े सितारे को साइन कर लेते हैं तो वे मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हैं।

यह प्रस्ताव किसी भी निर्देशक के लिए लालच भरा हो सकता था लेकिन हंसल मेहता अपनी बात पर अड़े रहे। अगर प्रतीक गांधी लीड रोल में रहेंगे तो वे इस प्रोजेक्ट में निवेश नहीं कर सकते यह जवाब सुनकर हंसल मेहता को काफी निराशा हुई।

हंसल मेहता के लिए यह एक बहुत बड़ा भावनात्मक धक्का था क्योंकि वह जानते थे कि कोई भी बड़ा बॉलीवुड स्टार इस किरदार में वह असलियत नहीं ला पाएगा। स्टार्स के नखरे उनकी डेट्स की समस्या और सबसे बढ़कर उनका अपना स्थापित व्यक्तित्व हर्षद मेहता की कहानी को बर्बाद कर देता।

मेहता अपने फैसले पर अडिग रहे और उन्होंने साफ कह दिया कि यह सीरीज बनेगी तो सिर्फ और सिर्फ प्रतीक गांधी के साथ वरना वह इसे बनाएंगे ही नहीं। इस जिद के कारण प्रोजेक्ट कई महीनों तक अधर में लटका रहा और एक बेहतरीन स्क्रिप्ट धूल फांकने को मजबूर हो गई।

समीर नायर का वह फैसला जिसने बदल दी वेब सीरीज की दिशा

जब हर तरफ से निराशा हाथ लग रही थी और ऐसा लग रहा था कि शायद यह सीरीज कभी नहीं बन पाएगी तब इस कहानी में एंट्री हुई एक ऐसे इंसान की जिसने टीवी का इतिहास बदला था। अप्लॉज एंटरटेनमेंट के प्रमुख समीर नायर वह शख्स हैं जिन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे शो से भारतीय दर्शकों की सोच को नया आकार दिया था।

नायर को भारतीय दर्शकों की नब्ज की बहुत गहरी समझ है और वह सितारों से ज्यादा कहानी की ताकत पर विश्वास करते हैं। जब हंसल मेहता ने यह स्क्रिप्ट और अपनी कास्टिंग का विजन समीर नायर के सामने रखा तो वहां स्टारडम या ए लिस्टर्स की कोई लंबी चौड़ी बहस नहीं हुई।

समीर नायर ने सिर्फ कहानी सुनी हंसल के विजन को गहराई से समझा और बिना किसी हिचकिचाहट के कह दिया कि हम यह सीरीज उसी तरह बनाएंगे जैसा आप चाहते हैं। नायर का यह फैसला हंसल मेहता के लिए एक नई सुबह की तरह था जिसने उनके अंदर के फिल्ममेकर को एक नई ऊर्जा से भर दिया।

अप्लॉज एंटरटेनमेंट ने इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी और बिना किसी समझौते के इसे बड़े पैमाने पर बनाने का फैसला किया। बाद में सोनी लिव ने भी इस प्रोजेक्ट पर भरोसा जताया और इसे अपने प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने का जिम्मा उठाया।

समीर नायर के इस विश्वास ने यह साबित कर दिया कि अगर प्रोड्यूसर कहानी पर भरोसा करे तो एक्सेल शीट्स के आंकड़ों को भी झुठलाया जा सकता है।

इस ऐतिहासिक जंग और सीरीज निर्माण से जुड़े कुछ अनसुने पहलू

इस सीरीज के बनने की प्रक्रिया में कई ऐसे दिलचस्प मोड़ आए जो आम दर्शकों की नजरों से दूर रहे और जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को और भी ज्यादा खास बना दिया।

  • हंसल मेहता ने प्रतीक गांधी का कोई फॉर्मल ऑडीशन नहीं लिया था बल्कि उन्होंने प्रतीक के एक मशहूर नाटक ‘मोहन का मसाला’ को देखकर ही यह तय कर लिया था कि यही मेरा हर्षद है
  • सीरीज की शूटिंग के दौरान प्रतीक गांधी को अपना वजन काफी बढ़ाना पड़ा था ताकि वह हर्षद मेहता के लुक में पूरी तरह से ढल सकें और इसके लिए उन्होंने अपनी फिटनेस रूटीन को पूरी तरह बदल दिया था
  • जब सीरीज का पहला टीजर रिलीज हुआ तो इंडस्ट्री के कई दिग्गजों को लगा था कि बिना किसी बड़े स्टार के यह सीरियस फाइनेंसियल ड्रामा दर्शकों का ध्यान नहीं खींच पाएगा
  • अचिंत ठक्कर द्वारा तैयार किया गया इसका आइकोनिक बैकग्राउंड म्यूजिक शुरुआत में सिर्फ एक छोटा सा प्रयोग था लेकिन रिलीज के बाद यह भारत का सबसे ज्यादा डाउनलोड किया जाने वाला रिंगटोन बन गया
  • सीरीज में इस्तेमाल की गई पुरानी कारें और मुंबई के पुराने लोकेशन्स को ढूंढने में प्रोडक्शन टीम को महीनों लग गए थे ताकि नब्बे के दशक का असली फील आ सके
  • प्रतीक गांधी को कास्ट करने की जिद ने बॉलीवुड के उस मिथक को हमेशा के लिए तोड़ दिया जिसमें माना जाता था कि बिना पीआर और गॉडफादर के कोई क्षेत्रीय कलाकार हिंदी में राज नहीं कर सकता

स्कैम 1992 के बाद कैसे बदला फिल्म इंडस्ट्री का नजरिया

अक्टूबर दो हजार बीस में जब यह सीरीज रिलीज हुई तो जो हुआ वह अपने आप में एक बहुत बड़ा इतिहास है। सीरीज की रिलीज के कुछ ही दिनों के भीतर पूरे देश में हर्षद मेहता और प्रतीक गांधी के नाम का डंका बजने लगा।

प्रतीक गांधी का वह एक डायलॉग ‘रिस्क है तो इश्क है’ देखते ही देखते पूरे देश का नेशनल एंथम बन गया और हर युवा की जुबान पर चढ़ गया। जिन प्लेटफॉर्म्स ने इस सीरीज को रिजेक्ट किया था उनके अधिकारी शायद आज भी अपने उस गलत फैसले पर पछताते होंगे।

इस सीरीज की अपार सफलता ने ओटीटी की दुनिया में एक बहुत बड़ी क्रांति ला दी और रातों रात प्रतीक गांधी भारत के सबसे चहेते सुपरस्टार बन गए। इस सफलता का सबसे बड़ा और सकारात्मक असर यह हुआ कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का नजरिया पूरी तरह से बदल गया और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ।

अब हर कास्टिंग डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बड़े स्टार्स के बजाय कहानी की मांग के अनुसार अच्छे एक्टर्स की तलाश करने लगा। जयदीप अहलावत पंकज त्रिपाठी और प्रतीक गांधी जैसे कलाकारों को उनके टैलेंट के दम पर मेनस्ट्रीम में मुख्य भूमिकाएं मिलने का रास्ता साफ हो गया।

हंसल मेहता की वह जिद और समीर नायर का वह अटूट विश्वास सिर्फ एक सीरीज की जीत नहीं थी बल्कि यह भारतीय सिनेमा के उन तमाम कलाकारों की जीत थी। यह उन सभी थिएटर आर्टिस्ट्स और स्ट्रगलिंग एक्टर्स की जीत थी जो सालों से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे और जिन्हें सिर्फ उनके नाम की वजह से नकारा जा रहा था।

इस एक घटना ने बॉलीवुड के उस खोखले स्टार सिस्टम की नींव हिला दी जो सालों से टैलेंट पर हावी था और यह साबित कर दिया कि कंटेंट ही असली किंग है।

टैलेंट की वह जीत जिसने दिखा दिया स्टारडम का असली आईना

हंसल मेहता और प्रतीक गांधी की यह शानदार यात्रा हमें सिखाती है कि जब कोई कलाकार अपनी कला के प्रति पूरी तरह से ईमानदार होता है तो रास्ते की हर रुकावट अंततः एक नई मंजिल का निर्माण करती है।

आज जब हम स्कैम 1992 को देखते हैं तो हमें सिर्फ दलाल स्ट्रीट के हर्षद मेहता की कहानी नहीं दिखती बल्कि हमें उन सभी रिजेक्शन्स की गूंज सुनाई देती है जिन्हें पार करके यह सीरीज हम तक पहुंची है। हंसल मेहता की जिद और समीर नायर के भरोसे ने इस देश को प्रतीक गांधी के रूप में एक ऐसा बेशकीमती हीरा दिया है जिसकी चमक आने वाले कई दशकों तक फीकी नहीं पड़ेगी।

यह कहानी हमेशा इंडस्ट्री के उन लोगों को याद दिलाती रहेगी कि अगर आपकी नींव सच्चे टैलेंट पर टिकी है तो आपको किसी स्टारडम की बैसाखी की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। स्कैम 1992 की सबसे बड़ी और सच्ची विरासत यही है कि इसने भारत में असली अभिनय कला को वह सम्मान दिलाया जिसकी वह हमेशा से हकदार थी।

Sanket Kala

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