‘बाजीगर’ का वो अनसुना किस्सा जब सलमान खान के एक इंकार ने शाहरुख खान को बॉलीवुड का बादशाह बना दिया

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Shah Rukh Khan and Salman Khan with Baazigar untold story background

बॉलीवुड का इतिहास ऐसी कई अनगिनत और दिलचस्प कहानियों से भरा पड़ा है जहाँ एक छोटी सी हाँ या ना ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा बदल कर रख दी। यह कहानी है नब्बे के दशक की शुरुआत की जब हिंदी सिनेमा में सिर्फ सीधे सादे और रोमांटिक हीरो का बोलबाला हुआ करता था। उस दौर में कोई भी मुख्य अभिनेता पर्दे पर बुरा इंसान बनने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था और हर किसी को अपनी साफ़ सुथरी छवि बहुत प्यारी थी।

उन दिनों पर्दे पर खलनायक का मतलब सिर्फ अमरीश पुरी, गुलशन ग्रोवर या प्रेम चोपड़ा जैसे स्थापित नाम ही हुआ करते थे जो सिर्फ बुराई का प्रतीक माने जाते थे। किसी भी फिल्म के मुख्य नायक से यह उम्मीद नहीं की जाती थी कि वह परदे पर किसी भी तरह का कोई अपराध करेगा या किसी बेगुनाह को नुकसान पहुंचाएगा।

ऐसे बेहद सुरक्षित और एक ही ढर्रे पर चल रहे समय में दो निर्देशक भाई सफेद कपडे पहने हुए एक ऐसी कहानी लेकर फिल्म इंडस्ट्री के अलग अलग स्टूडियो के चक्कर लगा रहे थे जिसमें फिल्म का हीरो ही असल में पूरी कहानी का सबसे बड़ा विलेन था। यह कहानी थी एक ऐसे लड़के की जो अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था।

यह वही ऐतिहासिक कहानी है जिसने आगे चलकर हिंदी सिनेमा में एक ऐसे ग्लोबल सुपरस्टार को जन्म दिया जिसे आज पूरी दुनिया प्यार और रोमांस के निर्विवाद बादशाह के नाम से जानती है। लेकिन इस दिलचस्प कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सफलता का यह शानदार ताज पहले किसी और ही अभिनेता के सिर पर सजने वाला था।

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इस विशेष लेख में हम उस ऐतिहासिक लम्हे की गहराई में उतरेंगे जब ब्लॉकबस्टर फिल्म बाजीगर की कास्टिंग की प्रक्रिया चल रही थी। हम जानेंगे कि कैसे सलमान खान के एक अप्रत्याशित रिजेक्शन ने उस समय संघर्ष कर रहे शाहरुख खान के लिए सफलता के ऐसे विशाल दरवाजे खोले जो आज तीन दशक बाद भी बंद नहीं हुए हैं। आप यह भी जानेंगे कि कैसे इस एक अकेले फैसले ने सिर्फ एक फिल्म की किस्मत नहीं बल्कि दो सबसे बड़े सुपरस्टारों की पूरी जिंदगी, उनका करियर ग्राफ और उनकी कुल संपत्ति की दास्तान को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।

90 के दशक का वो सुनहरा दौर जब परदे पर हीरो सिर्फ रोमांस की भाषा बोलते थे

साल उन्नीस सौ बानवे के आस पास का समय हिंदी सिनेमा के लिए एक बहुत ही नाजुक बदलाव का दौर था जहाँ पुरानी पीढ़ी के सितारे अपनी जगह नई पीढ़ी को सौंप रहे थे। उस समय सलमान खान अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म मैंने प्यार किया की अपार सफलता के बाद देश भर के युवाओं के दिलों की धड़कन बन चुके थे।

दर्शकों के बीच सलमान खान की छवि एक बेहद आदर्श प्रेमी और एक आज्ञाकारी बेटे की बन चुकी थी जो अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकता था लेकिन वह कभी किसी बेगुनाह को नुकसान नहीं पहुंचा सकता था। इंडस्ट्री के बड़े से बड़े और नामी निर्माता निर्देशक उन्हें अपनी नई फिल्मों में उसी चॉकलेटी और सुरक्षित हीरो के रूप में देखना चाहते थे।

दूसरी तरफ इंडस्ट्री में कदम रख रही अब्बास मस्तान नाम की प्रतिभाशाली निर्देशक जोड़ी हॉलीवुड की एक मशहूर किताब अ किस बिफोर डाइंग से बहुत अधिक प्रेरित होकर एक बेहद डार्क और खौफनाक स्क्रिप्ट तैयार कर चुकी थी। इस नई स्क्रिप्ट में मुख्य किरदार एक ऐसा इंसान था जो अपने फायदे और अपने पुराने बदले के लिए अपनी ही प्रेमिका को एक ऊंची इमारत की छत से धक्का देकर मार देता है।

उस दौर के सामाजिक और सिनेमाई माहौल के हिसाब से यह विचार बहुत ही ज्यादा खतरनाक था क्योंकि तब यह पक्का माना जाता था कि अगर किसी हीरो ने पर्दे पर कोई ऐसा बुरा काम किया तो दर्शक उसे असल जिंदगी में भी पूरी तरह से नकार देंगे। इसी अनजाने डर के कारण अब्बास मस्तान को अपनी इस महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए सही चेहरा तलाशने में सच में लोहे के चने चबाने पड़ रहे थे।

एक खौफनाक स्क्रिप्ट जिसे उस दौर के सबसे बड़े सितारों ने डर कर ठुकरा दिया

अब्बास मस्तान को अपने इस अनोखे और बेहद डार्क प्रोजेक्ट के लिए एक ऐसे मासूम चेहरे की तलाश थी जिसकी आंखें सच्चाई से भरी हों ताकि जब वह परदे पर कोई हत्या करे तो दर्शकों को एक गहरा मनोवैज्ञानिक झटका लगे। उनकी सबसे पहली पसंद उस दौर के बहुत बड़े और स्थापित सुपरस्टार अनिल कपूर थे जो लगातार हिट फ़िल्में दे रहे थे।

लेकिन अनिल कपूर ने पूरी कहानी सुनने के बाद यह कहकर साफ मना कर दिया कि यह डार्क किरदार उनके स्थापित करियर और मिस्टर इंडिया वाली पारिवारिक छवि के लिए बहुत बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। इसके बाद निराश हुए निर्देशक जोड़ी ने उस समय तेजी से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे युवा सितारे सलमान खान का दरवाजा खटखटाया।

सलमान खान को कहानी का कुछ शुरुआती हिस्सा बहुत पसंद तो आया लेकिन उन्हें भी फिल्म के हीरो के इस कदर नकारात्मक होने पर काफी संदेह था। अपने इस गहरे असमंजस और दुविधा को दूर करने के लिए सलमान ने अपने पिता और बॉलीवुड के सबसे मशहूर लेखक सलीम खान से सलाह लेने का फैसला किया जो कहानियों की बहुत ही गहरी और सटीक समझ रखते थे।

सलीम खान ने पूरी स्क्रिप्ट बहुत ध्यान से सुनने के बाद अब्बास मस्तान से साफ़ शब्दों में कहा कि इस कहानी में हीरो के इतने बुरे बनने का कोई भी बहुत मजबूत या भावनात्मक कारण नहीं है इसलिए इसमें एक बेबस मां का एंगल जरूर जोड़ना चाहिए। सलीम साहब का यह स्पष्ट मानना था कि अगर फिल्म का हीरो अपनी बेचारी मां के आंसुओं का बदला ले रहा है तो भारतीय दर्शक उसके द्वारा किये गए खून को भी आसानी से माफ़ कर देंगे।

उस वक्त अब्बास मस्तान अपनी मूल और कसी हुई कहानी के साथ कोई भी बड़ी छेड़छाड़ करने को बिलकुल तैयार नहीं थे और उन्होंने उस समय इस बदलाव को करने से विनम्रता से इंकार कर दिया। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि सलमान खान ने इस फिल्म को करने से साफ़ और कड़े शब्दों में मना कर दिया और यह शानदार स्क्रिप्ट वापस एक ठंडे डिब्बे में जाने के कगार पर आ खड़ी हुई।

और फिर हुई एक नए लड़के की एंट्री जिसकी आंखों में एक अलग तरह की भूख थी

जब हर तरफ से सिर्फ निराशा और हताशा हाथ लगने लगी तब अब्बास मस्तान की मुलाकात एक ऐसे ऊर्जावान युवा अभिनेता से हुई जो उस समय टीवी की छोटी दुनिया से निकलकर फिल्मों के बड़े पर्दे पर अपना मुकाम बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा था। यह पतला सा लड़का कोई और नहीं बल्कि शाहरुख खान थे जिनकी फिल्म दीवाना अभी हाल ही में रिलीज हुई थी और उन्हें इंडस्ट्री में अपनी एक पक्की जगह बनानी थी।

शाहरुख के पास उस समय इंडस्ट्री में खोने के लिए कोई भी स्थापित पारिवारिक छवि नहीं थी और पाने के लिए उनके सामने पूरा खुला आसमान मौजूद था। जब शाहरुख खान ने बाजीगर की वह खतरनाक और डार्क कहानी सुनी तो वह बिना कोई समय बर्बाद किये तुरंत इस चुनौती भरे किरदार को निभाने के लिए खुशी खुशी तैयार हो गए।

उन्होंने इस मुश्किल चुनौती को अपने जीवन के सबसे बड़े अवसर के रूप में देखा और अब्बास मस्तान को पूरा भरोसा दिलाया कि वह इस जटिल किरदार में अपनी पूरी जान और अपनी सारी ऊर्जा फूंक देंगे। शाहरुख की इस जबरदस्त सकारात्मकता को देखकर निर्देशकों को भी लगा कि शायद उन्हें उनकी फिल्म का असली बाजीगर आखिरकार मिल ही गया है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि शाहरुख ने उस नकारात्मक किरदार को इतनी ज्यादा शिद्दत और एक अलग ही स्टाइल के साथ निभाया कि फिल्म के सेट पर काम करने वाले हर व्यक्ति को लगने लगा था कि कुछ बहुत ही जादुई और भारतीय सिनेमा में बिल्कुल अलग बनने जा रहा है। शाहरुख ने अपने कपड़ों से लेकर अपनी खौफनाक हंसी तक सब कुछ बाजीगर के उस डार्क किरदार के हिसाब से पूरी तरह ढाल लिया था।

बाजीगर फिल्म के निर्माण से जुड़ी कुछ बेहद अनसुनी और चौंकाने वाली बातें

बाजीगर फिल्म के निर्माण और उसके परदे के पीछे के संघर्ष से जुड़े कई ऐसे दिलचस्प तथ्य हैं जो आज तीन दशक बाद भी आम दर्शकों और प्रशंसकों की नजरों से काफी दूर हैं। आइए उन सुनहरे पन्नों को पलट कर देखते हैं।

जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तब कई बड़े वितरकों ने इस फिल्म को खरीदने से साफ़ मना कर दिया था क्योंकि उन्हें पक्का विश्वास था कि एक खूंखार विलेन को हीरो के रूप में कोई भी भारतीय दर्शक स्वीकार नहीं करेगा।

जिस मां के इमोशनल एंगल की बात अनुभवी लेखक सलीम खान ने शुरुआत में की थी उसे अब्बास मस्तान ने बाद में सच में फिल्म की स्क्रिप्ट में शामिल कर लिया था और अभिनेत्री राखी के उसी किरदार ने फिल्म में सबसे बड़ी इमोशनल गहराई पैदा की।

यह भारतीय सिनेमा की वह पहली फिल्म थी जिसमें चुलबुली काजोल और शाहरुख खान की जोड़ी पहली बार पर्दे पर नजर आई थी जिसने आगे चलकर बॉलीवुड की सबसे महान और आइकोनिक रोमांटिक जोड़ी का रूप ले लिया।

इस फिल्म से अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने अपना बॉलीवुड डेब्यू किया था और उनके किरदार को जिस तरह से परदे पर पेश किया गया उसने रातों रात उन्हें पूरे देश में मशहूर कर दिया था।

मशहूर संगीतकार अनु मलिक को इस फिल्म के संगीत को तैयार करने के लिए कई रातों की अपनी नींद गंवानी पड़ी थी क्योंकि निर्देशक चाहते थे कि कैसे भी करके इस फिल्म का हर एक गाना ब्लॉकबस्टर चार्टबस्टर होना चाहिए।

हीरो द्वारा नायिका को इमारत की छत से धक्का देने वाला वो खौफनाक सीन आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे चौंकाने वाले और प्रतिष्ठित दृश्यों में गिना जाता है जिसे शूट करते वक्त खुद सेट पर मौजूद क्रू मेंबर्स भी बुरी तरह सिहर उठे थे।

बॉक्स ऑफिस का वो ऐतिहासिक तूफान जिसने पूरे देश में तहलका मचा दिया

साल उन्नीस सौ तिरानवे के अंत में जब बाजीगर आख़िरकार देश भर के सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो बॉक्स ऑफिस पर जो हुआ वह किसी बड़े चमत्कार से बिल्कुल भी कम नहीं था। पहले ही दिन से दर्शकों की भारी भीड़ थिएटर्स के बाहर उमड़ने लगी और फिल्म की बेहद कसी हुई कहानी ने लोगों को अपनी सीटों से पूरी तरह बांधे रखा।

शाहरुख खान का वो मशहूर डायलॉग कि कभी कभी कुछ जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है और हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं उस दौर के पूरे देश के युवाओं की जुबान पर हमेशा के लिए चढ़ गया। फिल्म का सुरीला संगीत हर गली और नुक्कड़ पर जोर जोर से बजने लगा और अनु मलिक की बनाई हुई धुनें रातों रात अमर हो गईं।

फ़िल्मों के बड़े बड़े आलोचक भी इस बात से बेहद हैरान थे कि आम दर्शकों ने एक ऐसे हीरो को इतनी आसानी से और इतने प्यार से अपना लिया जो परदे पर बेगुनाह लोगों का खून बहा रहा था। शाहरुख खान की उस एक फिल्म ने बॉलीवुड में हीरो की पुरानी और घिसी पिटी परिभाषा को पूरी तरह से और हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।

यह सिर्फ किसी एक फिल्म की साधारण सफलता नहीं थी बल्कि यह भारतीय सिनेमा में एक नए युग की बहुत बड़ी शुरुआत थी जिसमें ग्रे शेड्स और डार्क किरदारों के लिए हमेशा के लिए दरवाजे खुल चुके थे। शाहरुख खान ने अपनी कड़ी मेहनत और अपने जोखिम उठाने की अपार क्षमता से यह साबित कर दिया था कि वे सच में बहुत लंबी रेस के घोड़े हैं।

एक रिजेक्शन ने कैसे तय किया दोनों सितारों का भविष्य और उनकी अरबों की नेट वर्थ

अगर हम आज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पीछे मुड़कर देखें तो बाजीगर सच में सिर्फ एक हिट फिल्म नहीं थी बल्कि वह एक ऐसा ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट थी जिसने शाहरुख खान और सलमान खान दोनों के पूरे करियर ग्राफ और उनकी अरबों की कुल संपत्ति की कहानी हमेशा के लिए लिख दी। इस एक फिल्म ने अर्थशास्त्र और स्टारडम दोनों के मायने बदल दिए।

बाजीगर की अपार और ऐतिहासिक सफलता के बाद शाहरुख खान रातों रात बॉलीवुड के सबसे बड़े और सबसे महंगे सुपरस्टार बन गए और उन्हें धड़ाधड़ नई फ़िल्में मिलने लगीं। इसी फिल्म में उनके शानदार अभिनय ने यश चोपड़ा जैसे दिग्गजों का ध्यान अपनी तरफ खींचा जिसके तुरंत बाद डर और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में उनके झोली में आ गिरीं।

शाहरुख खान की नेट वर्थ जो उस संघर्ष के समय शायद चंद रुपयों या लाखों में सिमटी हुई थी वो आज बढ़कर कई हज़ारों करोड़ के जादुई आंकड़े को पार कर चुकी है। अंतरराष्ट्रीय ब्रांड एंडोर्समेंट से लेकर अपने खुद के प्रोडक्शन हाउस रेड चिलीज एंटरटेनमेंट और अपनी क्रिकेट टीम तक उन्होंने जो भी विशाल साम्राज्य खड़ा किया है उसकी सबसे पहली और सबसे ठोस ईंट बाजीगर की वह सफलता ही थी।

वहीं दूसरी तरफ सुपरस्टार सलमान खान को कई सालों बाद इस बात का बहुत गहरा अहसास हुआ कि उस समय युवावस्था में उनसे कितनी बड़ी व्यावसायिक चूक हुई थी। टेलीविजन के मशहूर शो आप की अदालत में सलमान खान ने खुद हंसते हुए यह बात स्वीकार की थी कि अगर उन्होंने उस समय बाजीगर कर ली होती तो आज शायद शाहरुख खान के बंगले मन्नत में वो खुद रह रहे होते।

हालांकि सलमान खान ने भी अपनी लगातार मेहनत और अपने एक बिल्कुल अलग माचो अंदाज से बॉक्स ऑफिस पर कई दशकों तक राज किया और अपनी खुद की हज़ारों करोड़ों की विशाल नेट वर्थ बनाई। लेकिन बाजीगर छोड़ने का वो मशहूर किस्सा हमेशा उनके करियर के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा चर्चित सवालों में गिना जाता है जहाँ एक ना ने सब कुछ बदल दिया।

दोनों ही महान कलाकारों ने समय के साथ अपने अपने खास तरीके से सफलता की सबसे ऊंची बुलंदियों को छुआ और दर्शकों का भरपूर प्यार पाया। लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि इस एक फिल्म ने शाहरुख खान को शुरुआती दौर में वह जबरदस्त बढ़त दी जिसने उन्हें भारत के साथ साथ पूरी दुनिया में एक ग्लोबल आइकॉन बना दिया।

वो हार कर जीतने वाला जादू जो हमेशा के लिए हिंदी सिनेमा में अमर हो गया

सिनेमा की इस चमक दमक वाली दुनिया में अपने स्थापित करियर को दांव पर लगाकर कोई बड़ा जोखिम उठाना हर किसी अभिनेता के बस की बात नहीं होती। जब सलमान खान ने अपनी सुरक्षित छवि को चुनते हुए इस डार्क फिल्म को नकारा तो उन्होंने असल में वही किया जो उस समय का हर सफल और बड़ा सितारा अपनी जगह बचाने के लिए करता।

लेकिन शाहरुख खान का वह अभिनय के प्रति पागलपन और कुछ नया कर गुजरने की वह जबरदस्त भूख ही थी जिसने बाजीगर जैसी फिल्म को आज एक कालजयी और क्लासिक रचना बना दिया। आज भी जब कोई नया और युवा अभिनेता इंडस्ट्री में अपना पहला कदम रखता है तो उसे हिम्मत देने के लिए सबसे पहले बाजीगर का ही शानदार उदाहरण दिया जाता है।

यह अद्भुत कहानी हमें जिंदगी का यह फलसफा सिखाती है कि कई बार जीवन के सबसे बड़े मौके उन अनदेखी चीजों में गहराई से छिपे होते हैं जिन्हें बाकी सारे लोग डर कर या घबरा कर छोड़ देते हैं। अब्बास मस्तान का वह दूरदर्शी विजन, सलमान खान की वह एक छोटी सी ना और शाहरुख खान की वह ऐतिहासिक हाँ आज बॉलीवुड के सुनहरे और अमर पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है।

जब तक दुनिया में हिंदी सिनेमा का वजूद रहेगा तब तक हार कर जीतने वाले उस जादुई बाजीगर का जिक्र पूरे सम्मान के साथ होता रहेगा। उस बाजीगर ने दुनिया को दिखा दिया कि एक साधारण से रिजेक्शन को अपने जीवन की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत में कैसे तब्दील किया जाता है और असली बादशाह हमेशा वही होता है जो किस्मत के भरोसे नहीं बैठता बल्कि अपने फैसले खुद लिखता है।

Sanket Kala

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