बॉलीवुड के सबसे ताकतवर लेखकों की जुदाई का वो पन्ना जिसे आज भी खंगाला जाता है

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Salim Javed split reason

भारतीय सिनेमा के इतिहास में यूं तो कई जोड़ियां बनी और परदे के पीछे गुम हो गईं, लेकिन जब भी किसी ऐसी जोड़ी का जिक्र होता है जिसने अभिनेताओं से ज्यादा शोहरत कमाई, तो सिर्फ एक ही नाम जेहन में आता है और वो है सलीम-जावेद। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि शोहरत की सबसे ऊंची चोटी पर बैठी ये जोड़ी अचानक एक दिन ताश के पत्तों की तरह बिखर गई और दोनों ने अपने रास्ते हमेशा के लिए अलग कर लिए।

क्या यह महज़ एक रचनात्मक मतभेद था या फिर किसी बड़े सुपरस्टार के एक फैसले ने इनके बीच की उस दीवार को खड़ा कर दिया जिसे फिर कभी गिराया नहीं जा सका। दीप्ताकीर्ति चौधरी की मशहूर किताब ‘रिटन बाय सलीम-जावेद’ में इस ऐतिहासिक अलगाव के उन पन्नों को खोला गया है जिन पर सालों से खामोशी की धूल जमी थी।

आज हम इसी किताब के पन्नों से उस रात की कहानी बाहर ला रहे हैं जब एक अदृश्य इंसान की स्क्रिप्ट ने बॉलीवुड की सबसे मजबूत दोस्ती को हमेशा के लिए दृश्य से गायब कर दिया। यह सिर्फ दो लेखकों के अलग होने की कहानी नहीं है बल्कि यह उस दौर की दास्तान है जब एक कलम की ताकत किसी भी बड़े स्टूडियो या सुपरस्टार के रसूख से कहीं ज्यादा हुआ करती थी।

जब टाइपराइटर की खटखट से लिखे जाते थे मुकद्दर

एक वक्त था जब हिंदी सिनेमा में लेखकों को वो सम्मान नहीं मिलता था जिसके वे असल हकदार थे। सेट पर उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी और फिल्मों के पोस्टर पर उनका नाम किसी कोने में बहुत छोटे अक्षरों में लिखा जाता था। लेकिन सलीम खान और जावेद अख्तर ने जब अपनी कलम उठाई तो उन्होंने सिर्फ कहानियां नहीं लिखीं बल्कि उन्होंने बॉलीवुड के काम करने का पूरा व्याकरण ही बदल कर रख दिया।

सलीम खान एक बेहद हैंडसम युवक थे जो हीरो बनने का ख्वाब लेकर आए थे, जबकि जावेद अख्तर एक क्लैपर बॉय के तौर पर अपनी पहचान तलाश रहे थे। इन दोनों की मुलाकात एक इत्तेफाक थी लेकिन जब दोनों के विचार मिले तो जो चिंगारी उठी उसने पूरे भारतीय सिनेमा को रोशन कर दिया।

इन्होंने अपनी शर्तों पर काम करना शुरू किया और निर्माताओं को मजबूर कर दिया कि फिल्म के पोस्टर पर अभिनेताओं के बराबर ही लेखकों का नाम भी छापा जाए। उनका रुतबा ऐसा था कि जब वे कहानी सुनाने किसी प्रोड्यूसर के दफ्तर जाते थे तो वहां का माहौल किसी बड़े स्टार की एंट्री जैसा हो जाता था।

जंजीर और शोले जिसने गढ़ा एक नया महानायक

सलीम-जावेद की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ‘एंग्री यंग मैन’ का वो तोहफा दिया जिसने हमेशा के लिए हीरो की परिभाषा को बदलकर रख दिया। जंजीर वो फिल्म थी जिसकी कहानी को देव आनंद से लेकर राज कुमार तक ने ठुकरा दिया था, लेकिन इन दोनों लेखकों को अपनी लिखी उस आग पर पूरा भरोसा था।

उन्होंने एक ऐसे लंबे और पतले अभिनेता पर दांव खेला जिसकी लगातार कई फिल्में फ्लॉप हो चुकी थीं और वो मुंबई छोड़कर वापस जाने की तैयारी कर रहा था। वो अभिनेता कोई और नहीं बल्कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन थे। जंजीर की बेतहाशा कामयाबी ने जहां अमिताभ को रातों-रात स्टार बना दिया, वहीं सलीम-जावेद को फिल्म इंडस्ट्री का सबसे कीमती हीरा साबित कर दिया।

इसके बाद शोले, दीवार, त्रिशूल और डॉन जैसी फिल्मों की झड़ी लग गई और हर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के नए कीर्तिमान स्थापित करने लगी। इन दोनों की लेखनी में ऐसा जादू था कि दर्शक सिनेमाघरों में सिर्फ हीरो को देखने नहीं बल्कि सलीम-जावेद के लिखे उन धारदार संवादों को सुनने जाते थे।

दरकती दीवारों के पीछे की वो खामोश दास्तान

कहा जाता है कि जब कामयाबी हद से ज्यादा बढ़ने लगती है तो अपने साथ कई अनकहे सवाल और असुरक्षा की भावनाएं भी लेकर आती है। 70 के दशक के आखिरी सालों तक सलीम-जावेद सफलता के उस शिखर पर पहुंच चुके थे जहां से नीचे का रास्ता सिर्फ खाई की तरफ जाता था।

फिल्म इंडस्ट्री में लोग दबी जुबान में यह चर्चा करने लगे थे कि इस जोड़ी में कहानी कौन सोचता है और संवाद कौन लिखता है। बाहर वालों की इन बातों ने कहीं न कहीं उस मजबूत दोस्ती की बुनियाद में पानी डालना शुरू कर दिया था जो कभी अटूट मानी जाती थी।

दीप्ताकीर्ति चौधरी अपनी किताब में इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि जब दो बेहद प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लोग एक साथ काम करते हैं तो एक समय के बाद उनके बीच अहम का टकराव होना लाजमी हो जाता है। धीरे-धीरे वो हंसी-मजाक और एक-दूसरे के विचारों को बिना शर्त मान लेने की आदत कम होने लगी थी।

सफलता के नशे में छुपे हुए कुछ अनकहे सवाल

यह वह दौर था जब हर बड़ा निर्माता उनके घर के बाहर लाइन लगाकर खड़ा रहता था और वे मुंहमांगी रकम वसूल करते थे। लेकिन पैसे और शोहरत की इस चमक के पीछे एक ऐसी खामोशी पनप रही थी जिसे दोनों ही नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे थे।

इंडस्ट्री के कुछ करीबियों का मानना था कि दोनों के काम करने के तरीके और भविष्य को लेकर उनकी सोच में अब पहले जैसी समानता नहीं रही थी। कोई अपने काम का अलग से श्रेय चाहता था तो कोई अपनी शर्तों पर नया साम्राज्य खड़ा करना चाहता था।

मिस्टर इंडिया की वो स्क्रिप्ट और अमिताभ बच्चन का सीधा इंकार

इसी खींचतान के बीच एक ऐसी कहानी ने जन्म लिया जो विज्ञान और फैंटेसी का एक अद्भुत मिश्रण थी। एक ऐसे आदमी की कहानी जो एक घड़ी पहनकर गायब हो जाता है और बुराई का खात्मा करता है। इस कहानी का नाम था मिस्टर इंडिया और सलीम-जावेद ने इसे अपने चहेते सितारे अमिताभ बच्चन को ध्यान में रखकर ही लिखा था।

जब यह स्क्रिप्ट पूरी तरह से तैयार हो गई तो वे इसे लेकर अमिताभ बच्चन के पास गए, जिन्हें वे अपना सबसे बेहतरीन आविष्कार मानते थे। उन्हें पूरा यकीन था कि अमिताभ इस अनोखी कहानी को सुनते ही तुरंत हां कर देंगे क्योंकि उनके बीच का भरोसा बहुत गहरा था।

लेकिन जब अमिताभ ने पूरी कहानी सुनी तो उनके चेहरे पर वो उत्साह नहीं था जिसकी इन दोनों लेखकों को उम्मीद थी। अमिताभ उस वक्त देश के सबसे बड़े सुपरस्टार थे और उनके प्रशंसक सिनेमाघरों में सिर्फ उनके चेहरे के हाव-भाव और उनकी आंखों का गुस्सा देखने आते थे।

महानायक की वो दलील जिसने बदल दिया इतिहास

अमिताभ बच्चन ने बहुत ही विनम्रता लेकिन दृढ़ता के साथ इस फिल्म को करने से मना कर दिया। उनका तर्क बहुत सीधा और स्पष्ट था कि अगर वो फिल्म के एक बड़े हिस्से में पर्दे से गायब रहेंगे और सिर्फ उनकी आवाज सुनाई देगी, तो उनके प्रशंसक खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे।

अमिताभ का मानना था कि उनके फैंस ने उन्हें पर्दे पर अभिनय करते देखने के लिए टिकट खरीदा है, ना कि एक खाली पर्दे से आती हुई आवाज सुनने के लिए। व्यावसायिक नजरिए से अमिताभ का यह सोचना बिल्कुल सही था लेकिन इस इंकार ने सलीम-जावेद के अहंकार को गहरी चोट पहुंचाई।

उन्हें लगा कि जिस स्टार को उन्होंने अपनी कलम से गढ़ा है वो आज उनकी लिखी सबसे महत्वाकांक्षी कहानी पर अविश्वास जता रहा है। दीप्ताकीर्ति चौधरी की किताब के अनुसार इसी इंकार ने उस दरार को एक गहरी खाई में तब्दील कर दिया जो पहले से ही दोनों लेखकों के बीच पनप रही थी।

इस ऐतिहासिक जोड़ी के टूटने के पांच सबसे बड़े कारण

सलीम-जावेद के अलग होने की घटना को सिर्फ एक कारण से नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि यह कई घटनाओं का मिला-जुला नतीजा था जिसे समझना बेहद जरूरी है

  • मिस्टर इंडिया की स्क्रिप्ट पर असहमति इस अलगाव का सबसे तात्कालिक कारण बनी जहां अमिताभ के इंकार ने दोनों के बीच के वैचारिक मतभेदों को सतह पर ला दिया
  • अमिताभ बच्चन के साथ भविष्य में काम करने या न करने को लेकर दोनों लेखकों की राय पूरी तरह से अलग हो चुकी थी जिसने उनके बीच दूरियां बढ़ा दीं
  • व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाने की चाहत ने उस साझीदारी को कमजोर कर दिया जो कभी एक-दूसरे की पूरक हुआ करती थी
  • बाहर के लोगों द्वारा यह तय करने की कोशिश कि कहानी सलीम की है और संवाद जावेद के, इस बंटवारे ने उनके भीतर एक मनोवैज्ञानिक दीवार खड़ी कर दी
  • समय के साथ हिंदी सिनेमा की बदलती मांग और काम के बढ़ते दबाव ने उनके सोचने के तरीके में वो तालमेल खत्म कर दिया जो जंजीर के समय हुआ करता था

वो एक शाम जब दो रास्तों में बंट गई एक ही मंजिल

किताबों और इंडस्ट्री के जानकारों के अनुसार मिस्टर इंडिया के उस एपिसोड के बाद दोनों के बीच की बातचीत लगभग खत्म सी हो गई थी। वे साथ बैठकर कहानियां तो बुन रहे थे लेकिन उनके दिलों के बीच की वो गर्मजोशी पूरी तरह से गायब हो चुकी थी।

फिर वो दिन भी आया जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को हिला कर रख दिया जब एक शाम जावेद अख्तर सलीम खान के पास गए और कहा कि उन्हें लगता है कि अब दोनों को अलग हो जाना चाहिए। यह फैसला रातों-रात नहीं लिया गया था बल्कि यह उन तमाम असहमतियों का चरम था जो महीनों से उनके भीतर सुलग रही थीं।

सलीम खान ने भी बिना किसी बहस के इस फैसले को स्वीकार कर लिया और इस तरह हिंदी सिनेमा की सबसे कामयाब जोड़ी ने एक-दूसरे से विदाई ले ली। उस दिन के बाद निर्देशकों और निर्माताओं के बीच एक अजीब सी बेचैनी फैल गई क्योंकि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब वे अपनी फिल्मों के लिए किसके पास जाएं।

सिनेमा के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गई एक अधूरी कहानी

आज दशकों बीत जाने के बाद भी सलीम-जावेद का नाम फिल्म जगत में एक मिसाल के तौर पर लिया जाता है। उनके अलग होने के बाद मिस्टर इंडिया की वो स्क्रिप्ट बोनी कपूर के पास गई और अनिल कपूर ने उस किरदार को निभाकर इतिहास रच दिया जिसे कभी अमिताभ के लिए लिखा गया था।

सलीम और जावेद दोनों ने अलग-अलग होकर भी बेहतरीन काम किया लेकिन जो जादू उन दोनों के साथ आने पर पैदा होता था वो फिर कभी किसी फिल्म में देखने को नहीं मिला। उनकी कहानी हमें बताती है कि सिनेमा की दुनिया में रिश्ते कितने ही गहरे क्यों न हों लेकिन रचनात्मक असहमति और समय का चक्र बड़े से बड़े तिलिस्म को भी तोड़ सकता है।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में शायद ही फिर कभी कोई ऐसी लेखकों की जोड़ी पैदा हो जो पर्दे के पीछे रहकर पूरे देश की धड़कनों पर राज कर सके। उनकी लिखी फिल्में और उनके टूटने का वो अनसुलझा राज आज भी सिनेमा के दीवानों के लिए किसी क्लासिक फिल्म की कहानी से कम नहीं है जिसे हर पीढी अपने तरीके से समझना चाहती है।

Sanket Kala

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