राज कपूर का सबसे बड़ा जुआ और आरके स्टूडियो के नीलाम होने की वो दर्दनाक अनसुनी कहानी

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Raj Kapoor bankruptcy story

जब एक महान कलाकृति ने छीन ली शोमैन की रातों की नींद

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे महत्वाकांक्षी और भव्य फिल्मों का जिक्र होता है तो ‘मेरा नाम जोकर’ का नाम सबसे ऊपर आता है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी बल्कि एक इंसान के जीवन का वो निचोड़ था जिसे उसने सेल्युलाइड पर उतारने के लिए अपनी आत्मा तक दांव पर लगा दी थी। राज कपूर ने इस फिल्म को अपना मास्टरपीस बनाने का सपना देखा था और इसके लिए उन्होंने समय, पैसा या अपनी सेहत किसी भी चीज की परवाह नहीं की।

इस कहानी का महत्व सिर्फ एक फिल्म के फ्लॉप होने तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक कलाकार के उस अदम्य साहस को दर्शाती है जो हार के सबसे गहरे अंधेरे में भी उम्मीद की किरण ढूंढ लेता है। रितु नंदा की किताब ‘राज कपूर स्पीक्स’ में इस बात का गहराई से वर्णन किया गया है कि कैसे इस एक फिल्म ने राज कपूर को अर्श से फर्श पर ला दिया था। इस लेख में हम उस दौर की परतों को खोलेंगे जब भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन को अपना ही घर और अपना सबसे प्यारा स्टूडियो बैंक के पास गिरवी रखना पड़ा था।

सपनों के महल की नींव और उस सुनहरे दौर की शुरुआत

राज कपूर के लिए आरके स्टूडियो सिर्फ ईंट और गारे से बनी कोई इमारत नहीं थी बल्कि यह उनके दिल का वो हिस्सा था जहां उनकी रचनात्मकता सांस लेती थी। शुरुआती दौर की बेतहाशा सफलताओं जैसे ‘आग’, ‘बरसात’ और ‘आवारा’ ने इस स्टूडियो को भारतीय सिनेमा का एक पवित्र मंदिर बना दिया था। इस स्टूडियो के हर कोने में राज कपूर के पसीने की महक और उनकी कला के प्रति समर्पण की गूंज सुनाई देती थी।

यह वो दौर था जब आरके बैनर का लोगो पर्दे पर आते ही दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से सिनेमाघर गुंजा देते थे। राज कपूर ने एक के बाद एक ब्लॉकबस्टर फिल्में देकर खुद को उस मुकाम पर स्थापित कर लिया था जहां से असफलता बहुत छोटी नजर आती थी। लेकिन वो कहते हैं न कि जब इंसान अपनी कला के नशे में सबसे ऊंचे शिखर पर होता है तो वहां से गिरने का खतरा भी सबसे ज्यादा होता है और यही राज कपूर के साथ भी होने वाला था।

एक ऐसी फिल्म का विचार जिसने सब कुछ दांव पर लगा दिया

‘मेरा नाम जोकर’ कोई अचानक आया हुआ विचार नहीं था बल्कि यह एक ऐसी कहानी थी जो सालों से राज कपूर के जहन में पल रही थी। वह एक सर्कस के जोकर के माध्यम से इंसान के जीवन के तीन अलग-अलग पड़ावों और उसकी मनोवैज्ञानिक गहराई को पर्दे पर उतारना चाहते थे। इस कहानी में उनका अपना जीवन, उनका दर्शन और उनका वह दर्द छिपा था जो एक कलाकार अपने चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा लगाकर दुनिया से छुपाता है।

इस सपने को साकार करने के लिए राज कपूर ने किसी भी तरह का समझौता करने से साफ इंकार कर दिया था। फिल्म का स्केल इतना बड़ा था कि इसके लिए विदेशी कलाकारों, असली सर्कस के जानवरों और दुनिया भर की बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया। यह एक ऐसा रचनात्मक जुआ था जिसमें राज कपूर अपनी पिछली सभी फिल्मों की कमाई और अपनी पूरी साख एक ही झटके में टेबल पर रख चुके थे।

छह साल की अथक तपस्या और एक शोमैन का पागलपन

इस महाकाव्य को पर्दे पर उतारने में एक या दो नहीं बल्कि पूरे छह साल का लंबा वक्त लगा। इन छह सालों में फिल्म इंडस्ट्री का ट्रेंड बदल गया था लेकिन राज कपूर अपने विजन से टस से मस नहीं हुए और वह इस फिल्म को एक हॉलीवुड क्लासिक की तरह बनाना चाहते थे। उन्होंने फिल्म में रूसी बैले डांसर से लेकर सोवियत संघ के मशहूर सर्कस कलाकारों को शामिल किया जिसका खर्च आसमान छू रहा था।

जैसे-जैसे फिल्म की शूटिंग आगे बढ़ रही थी वैसे-वैसे राज कपूर का बैंक बैलेंस खाली होता जा रहा था। रितु नंदा की किताब में इस बात का जिक्र है कि फिल्म को पूरा करने के लिए राज कपूर ने अपनी पत्नी के गहने तक दांव पर लगा दिए थे। वह इस फिल्म के मोहपाश में इस कदर बंध चुके थे कि उन्हें इसके आर्थिक परिणामों की कोई परवाह नहीं रही और बस किसी भी तरह इसे पूरा करना उनका इकलौता लक्ष्य बन गया था।

रिलीज का वो काला शुक्रवार जब सिनेमाघरों की खामोशी ने दिल चीर दिया

आखिरकार 1970 में वह दिन आ ही गया जब ‘मेरा नाम जोकर’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई और राज कपूर की धड़कनें तेज थीं। फिल्म की लंबाई चार घंटे से भी ज्यादा थी और इसमें दो इंटरवल रखे गए थे जो उस समय के दर्शकों के लिए एक बिल्कुल नया और अजीब अनुभव था। सिनेमाघरों में बैठे दर्शक जो राज कपूर की फिल्मों में चुलबुलापन और तेज रफ्तार रोमांस देखने के आदी थे, वे इस भारी-भरकम और दार्शनिक कहानी से खुद को जोड़ नहीं पाए।

प्रीमियर की उस रात सिनेमाघरों में तालियों की जगह एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी जो राज कपूर के दिल को किसी खंजर की तरह चीर रही थी। जैसे ही फिल्म खत्म हुई और लोग बाहर निकलने लगे तो उनके चेहरों की निराशा ने राज कपूर को बता दिया था कि उनका सबसे बड़ा सपना टूट कर बिखर चुका है। वह रात राज कपूर के जीवन की सबसे लंबी और खौफनाक रात थी जिसने उनके जीवन की पूरी दिशा ही बदल कर रख दी।

रितु नंदा की किताब में दर्ज वो पन्ने जो एक पिता के दर्द को बयां करते हैं

रितु नंदा ने ‘राज कपूर स्पीक्स’ में अपने पिता के उस दौर के दर्द को बहुत ही मार्मिक शब्दों में उकेरा है। उन्होंने बताया है कि कैसे फिल्म के फ्लॉप होने की खबर ने राज कपूर को अंदर तक तोड़ दिया था और वह कई रातों तक सो नहीं पाए थे। वह अपने कमरे में अकेले बैठे रहते थे और इस बात पर विचार करते थे कि आखिर दर्शकों ने उनकी सबसे ईमानदार कोशिश को क्यों नकार दिया।

किताब के अनुसार यह सिर्फ एक आर्थिक नुकसान नहीं था बल्कि यह राज कपूर के आत्मविश्वास पर हुआ सबसे बड़ा प्रहार था। उन्होंने जोकर के किरदार में अपनी आत्मा डाल दी थी और जब दर्शकों ने जोकर को नकारा तो राज कपूर को लगा जैसे दुनिया ने उनके वजूद को ही खारिज कर दिया हो। उस समय उनके करीबी दोस्तों और परिवार ने उन्हें बहुत संभालने की कोशिश की लेकिन वह दर्द इतना गहरा था कि उसे भरने में सालों लग गए।

पर्दे के पीछे की वो बातें जो इस महाकाव्य को अमर बनाती हैं

‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण और उसके परिणामों से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जो आज भी फिल्मकारों के लिए एक केस स्टडी की तरह काम करते हैं। आइए नजर डालते हैं इस फिल्म से जुड़ी कुछ ऐसी ही अनसुनी बातों पर

  • यह भारतीय सिनेमा की पहली ऐसी फिल्म थी जिसमें एक नहीं बल्कि दो इंटरवल रखे गए थे क्योंकि फिल्म की कहानी बहुत लंबी थी
  • फिल्म के एक सीन के लिए राज कपूर ने असली रशियन सर्कस को भारत बुलाया था जिसका खर्चा उस समय लाखों रुपये में था
  • मनोज कुमार और राजेंद्र कुमार जैसे उस दौर के सुपरस्टार्स ने इस फिल्म में बिना कोई फीस लिए काम किया था
  • फिल्म के संगीतकार शंकर-जयकिशन के साथ राज कपूर के कुछ मतभेद हुए थे लेकिन फिर भी फिल्म का संगीत कालजयी साबित हुआ
  • रिलीज के समय बुरी तरह फ्लॉप होने के बावजूद आज इस फिल्म की कैसेट्स और डीवीडी सबसे ज्यादा बिकने वाली फिल्मों की लिस्ट में शामिल हैं

कर्जे का वो विशाल पहाड़ और आरके स्टूडियो की चौखट पर खड़े बैंक अधिकारी

फिल्म के फ्लॉप होने का सबसे भयानक परिणाम इसके आर्थिक रूप में सामने आया जिसने कपूर परिवार की जड़ें हिला कर रख दीं। राज कपूर के सिर पर कर्ज का एक ऐसा पहाड़ टूट पड़ा था जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें नजर नहीं आ रहा था। डिस्ट्रीब्यूटर्स अपना पैसा वापस मांग रहे थे और बैंकों की तरफ से लगातार रिकवरी के नोटिस आरके स्टूडियो के पते पर पहुंचने लगे थे।

नौबत यहां तक आ गई कि राज कपूर को अपने जीवन की सबसे बड़ी कमाई यानी आरके स्टूडियो को बैंक के पास गिरवी रखना पड़ा। जिस स्टूडियो में उन्होंने अपने सपनों की दुनिया बसाई थी आज उसी स्टूडियो के दरवाजे पर नीलाम होने का खतरा मंडरा रहा था। रितु नंदा बताती हैं कि जब राज कपूर ने गिरवी के कागजातों पर हस्ताक्षर किए थे तो उनकी आंखों में आंसू थे और उनके हाथ कांप रहे थे।

राख के ढेर से फिर उठने की जिद और ‘बॉबी’ का वो जादुई सफर

लेकिन एक सच्चा कलाकार और एक सच्चा शोमैन कभी हार नहीं मानता और राज कपूर ने भी तय कर लिया था कि वह बिना लड़े हार नहीं मानेंगे। कर्ज चुकाने और अपना स्टूडियो वापस पाने के लिए उन्हें एक नई फिल्म बनानी थी लेकिन इस बार उनके पास किसी बड़े सुपरस्टार को कास्ट करने के पैसे नहीं थे। मजबूरी और हताशा के उसी दौर में राज कपूर ने अपने 20 साल के बेटे ऋषि कपूर और एक 16 साल की नई लड़की डिंपल कपाड़िया को लेकर ‘बॉबी’ बनाने का फैसला किया।

‘बॉबी’ कोई बहुत महान दार्शनिक फिल्म नहीं थी बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक टीनएज लव स्टोरी थी जिसे बहुत ही टाइट बजट में बनाया जा रहा था। राज कपूर ने इस फिल्म के संगीत के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल पर भरोसा जताया और उनसे कहा कि उन्हें ऐसे गाने चाहिए जो रातों-रात पूरे देश में छा जाएं। यह राज कपूर का जीवन बचाने की आखिरी कोशिश थी और उन्होंने इस फिल्म के निर्देशन में अपनी बची-खुची पूरी ताकत झोंक दी थी।

बॉक्स ऑफिस पर वो सुनामी जिसने कर्ज के सारे दाग धो डाले

जब 1973 में ‘बॉबी’ रिलीज हुई तो उसने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। फिल्म के गाने गली-गली में गूंजने लगे और युवा दर्शक इस नई प्रेम कहानी को देखने के लिए सिनेमाघरों पर टूट पड़े। ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया रातों-रात देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बन गए और फिल्म ने कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।

‘बॉबी’ से हुई छप्परफाड़ कमाई ने राज कपूर के जीवन में वह चमत्कार कर दिया जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी। इस फिल्म ने न सिर्फ ‘मेरा नाम जोकर’ का सारा कर्ज उतार दिया बल्कि राज कपूर को वह पैसा भी दिया जिससे उन्होंने शान से बैंक जाकर अपने आरके स्टूडियो के कागज वापस लिए। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे बड़े कमबैक की कहानी बन गई जिसने साबित कर दिया कि राज कपूर की कला में अभी भी वही पुरानी आग बाकी है।

एक फ्लॉप फिल्म का कल्ट क्लासिक में बदलना और शोमैन की असली जीत

समय सबसे बड़ा मरहम है और सबसे बड़ा न्यायधीश भी जो कला की सच्ची परख आने वाली पीढ़ियों के हाथों में सौंप देता है। जिस ‘मेरा नाम जोकर’ को 1970 के दर्शकों ने नकार दिया था वही फिल्म आने वाले दशकों में एक कल्ट क्लासिक का दर्जा हासिल कर गई। सिनेमा के जानकारों और नई पीढ़ी के दर्शकों ने जब इस फिल्म को टेलीविजन और होम वीडियो पर देखा तो उन्हें राज कपूर की दूरदर्शिता का अहसास हुआ।

आज इस फिल्म को भारतीय सिनेमा के पाठ्यक्रम का हिस्सा माना जाता है और इसके दृश्यों की तकनीक पर शोध किए जाते हैं। राज कपूर के जीवनकाल के अंतिम वर्षों में ही उन्हें इस बात का संतोष मिल गया था कि उनकी सबसे प्यारी फिल्म को आखिरकार वह सम्मान मिल गया जिसकी वह हकदार थी। एक फ्लॉप फिल्म का इस तरह से मास्टरपीस में तब्दील हो जाना राज कपूर की सबसे बड़ी सिनेमाई जीत थी जिसे कोई बॉक्स ऑफिस का आंकड़ा नहीं नाप सकता।

शो मस्ट गो ऑन की वो गूंज जो आज भी सिनेमा के गलियारों में जिंदा है

राज कपूर के जीवन की यह कहानी हमें सिखाती है कि असफलताएं कभी भी किसी इंसान के अंत की घोषणा नहीं करतीं बल्कि वे एक नई शुरुआत का मौका देती हैं। उन्होंने अपनी ही फिल्म के उस मशहूर संवाद ‘शो मस्ट गो ऑन’ को अपने असल जीवन में चरितार्थ करके दिखाया और दुनिया को बताया कि जिंदगी एक रंगमंच है। आरके स्टूडियो का गिरवी रखा जाना और फिर शान से वापस आना सिर्फ एक आर्थिक लेन-देन नहीं था बल्कि यह एक इंसान के अपने सपनों पर अटूट विश्वास की कहानी थी।

आज राज कपूर हमारे बीच नहीं हैं और आरके स्टूडियो की वह पुरानी इमारत भी अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है। लेकिन रितु नंदा की किताब और उनके द्वारा साझा किए गए ये किस्से आज भी हर उस इंसान को हिम्मत देते हैं जो अपने जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा हो। भारतीय सिनेमा जब तक जिंदा रहेगा राज कपूर की यह अमर दास्तान हर नए कलाकार के कानों में यही फुसफुसाती रहेगी कि चाहे कुछ भी हो जाए शो हमेशा चलते रहना चाहिए।

Sanket Kala

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