ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी के आखिरी पल और अस्पताल के बिल का वो कड़वा सच जो हर किसी को रुला देता है

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Meena Kumari Last Days tragic hospital story

क्या किसी लीजेंड की महानता उसके बैंक बैलेंस से तय होती है या उस दर्द से जो वो दुनिया से छुपाकर अपने सीने में दफन कर लेता है जब भी हम मीना कुमारी का नाम सुनते हैं तो जहन में एक बेहद खूबसूरत लेकिन उदास चेहरा उभर आता है आखिर क्या वजह थी कि जिस अदाकारा ने सिल्वर स्क्रीन पर राज किया और करोड़ों कमाए उसकी मौत एक ऐसे अस्पताल में हुई जहां उसका बिल चुकाने के लिए भी पैसे नहीं थे ये एक ऐसा सवाल है जो आज भी बॉलीवुड की चकाचौंध पर एक गहरा सवालिया निशान लगाता है

यह कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री के सुनहरे सफर की नहीं है बल्कि उस खौफनाक अकेलेपन की है जो शोहरत के पीछे छिपा होता है इस लेख में हम मशहूर पत्रकार विनोद मेहता की किताब मीना कुमारी द क्लासिक बायोग्राफी के पन्नों से उस दर्दनाक सच को खंगालेंगे हम जानेंगे कि कैसे पाकीजा की अपार सफलता के बीच एक सुपरस्टार तिल-तिल कर मौत के आगोश में समा रही थी यह एक ऐसा सफर है जो आपको भावुक कर देगा और स्टारडम की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराएगा

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बचपन की वो दहलीज जहां से शुरू हुआ आंसुओं का सफर

कहते हैं कि मीना कुमारी की जिंदगी में दुख उसी दिन लिखा गया था जिस दिन उन्होंने इस दुनिया में कदम रखा था उनके पिता अली बख्श और मां इकबाल बेगम एक बेटे की चाहत रखते थे लेकिन किस्मत ने उन्हें एक बेटी दे दी गरीबी इतनी थी कि जन्म के तुरंत बाद पिता ने नन्हीं महजबीं को एक अनाथालय के बाहर सीढ़ियों पर छोड़ दिया था हालांकि पिता का दिल पसीजा और कुछ ही घंटों बाद वो अपनी बच्ची को वापस ले आए लेकिन वो त्याग जैसे उनकी नियति बन गया

महजबीं बानो को कभी वो बचपन नसीब ही नहीं हुआ जो आम बच्चों को मिलता है महज सात साल की उम्र में जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं तब महजबीं को कैमरों और स्टूडियो की लाइटों के बीच धकेल दिया गया वो अक्सर स्टूडियो के कोने में बैठकर रोती थीं क्योंकि उन्हें स्कूल जाना था और पढ़ना था लेकिन परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी ने उस नन्हीं बच्ची के कंधों पर एक भारी बोझ डाल दिया था

बेबी महजबीं ने लेदरफेस नाम की फिल्म से अपने करियर की शुरुआत की थी उनका बचपन कैमरे के सामने दूसरों के लिखे डायलॉग बोलते हुए बीत गया शायद यही वजह थी कि उनके चेहरे पर एक ऐसी उदासी छा गई जो ताउम्र उनका साथ नहीं छोड़ पाई वो अक्सर कहती थीं कि उन्होंने कभी अपनी मर्जी से अभिनय नहीं किया बल्कि यह उनकी मजबूरी थी

वो एक फिल्म जिसने रातों-रात बदल दी किस्मत और पहचान

बेबी महजबीं धीरे-धीरे बड़ी हो रही थीं और उनके अभिनय में एक गजब की गहराई आ रही थी साल उन्नीस सौ बावन में आई फिल्म बैजू बावरा ने उनके करियर में एक ऐसा भूचाल ला दिया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी इस फिल्म ने महजबीं को मीना कुमारी बना दिया और रातों-रात वो पूरे देश की धड़कन बन गईं उनकी आंखों की कशिश और आवाज के दर्द ने दर्शकों को जैसे सम्मोहित कर लिया था

बैजू बावरा के बाद मीना कुमारी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दीं परिणीता से लेकर साहिब बीबी और गुलाम तक हर फिल्म में उन्होंने अपनी अदाकारी का ऐसा लोहा मनवाया कि लोग उनके दीवाने हो गए उन्हें बॉलीवुड की ट्रेजेडी क्वीन का खिताब दिया गया क्योंकि पर्दे पर वो दर्द को इतने जीवंत तरीके से जीती थीं लेकिन किसी को नहीं पता था कि पर्दे का वो दर्द दरअसल उनकी असल जिंदगी की ही एक परछाई था

शोहरत की बुलंदी और तन्हाई का खौफनाक सफर

मीना कुमारी की जिंदगी में कमाल अमरोही का आना एक ऐसा मोड़ था जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया कमाल अमरोही उम्र में उनसे काफी बड़े थे और पहले से शादीशुदा थे लेकिन मीना कुमारी उनके प्यार में पूरी तरह गिरफ्तार हो गईं दोनों ने गुपचुप तरीके से शादी कर ली लेकिन यह शादी मीना के लिए एक सुनहरे पिंजरे जैसी साबित हुई कमाल अमरोही ने उन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दीं और उनका मेकअप रूम तक किसी और के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया

विनोद मेहता अपनी किताब में लिखते हैं कि मीना कुमारी इस घुटन भरे माहौल में अंदर ही अंदर टूट रही थीं शादी में आई कड़वाहट और लगातार काम के तनाव ने उन्हें रातों की नींद से महरूम कर दिया था नींद ना आने की बीमारी से बचने के लिए उन्होंने अपने डॉक्टर की सलाह पर थोड़ी सी ब्रांडी लेना शुरू किया था लेकिन धीरे-धीरे यह ब्रांडी उनकी सबसे बड़ी दोस्त बन गई और शराब की लत ने उन्हें पूरी तरह जकड़ लिया

कमाल अमरोही से अलग होने के बाद मीना कुमारी की जिंदगी पूरी तरह बेपटरी हो गई उनका नाम धर्मेंद्र जैसे कई अभिनेताओं के साथ जुड़ा लेकिन उन्हें कभी वो सच्चा प्यार नहीं मिला जिसकी वो तलाश कर रही थीं शराब ने उनके शरीर को अंदर से खोखला करना शुरू कर दिया था और उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी पैसे और शोहरत की कोई कमी नहीं थी लेकिन उनके आस-पास सच्चे लोगों का भारी अकाल था

दर्द में डूबी पाकीजा के कुछ अनसुने और हैरान करने वाले पहलू

  • कमाल अमरोही का ड्रीम प्रोजेक्ट पाकीजा बनने में लगभग चौदह साल का लंबा वक्त लग गया था
  • दोनों के अलगाव की वजह से फिल्म की शूटिंग कई सालों तक रुकी रही और इसे डिब्बाबंद मान लिया गया था
  • सुनील दत्त और नर्गिस के कहने पर मीना कुमारी अपनी गिरती सेहत के बावजूद इस फिल्म को पूरा करने के लिए राजी हुईं
  • शूटिंग के आखिरी दिनों में मीना कुमारी इतनी बीमार थीं कि वो ठीक से चल भी नहीं पाती थीं
  • गाने चलो दिलदार चलो के कई सीन्स में मीना कुमारी की जगह बॉडी डबल का इस्तेमाल किया गया था
  • फिल्म जब रिलीज हुई तो शुरुआत में इसे ठंडा रिस्पॉन्स मिला लेकिन मीना कुमारी की मौत के बाद यह ब्लॉकबस्टर बन गई

मौत की दहलीज पर अस्पताल के बिल का वो दर्दनाक सच

पाकीजा की रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद मीना कुमारी की तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा विनोद मेहता ने अपनी किताब मीना कुमारी द क्लासिक बायोग्राफी में उनके आखिरी दिनों का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है मीना कुमारी को सेंट एलिजाबेथ नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था क्योंकि उनके लीवर ने काम करना लगभग बंद कर दिया था वो ब्लड वोमिटिंग कर रही थीं और धीरे-धीरे कोमा की तरफ बढ़ रही थीं

एक ऐसी अदाकारा जिसने फिल्म इंडस्ट्री को करोड़ों रुपये कमा कर दिए थे आज वो अस्पताल के बेड पर जिंदगी की भीख मांग रही थी उनके आस-पास उनके कुछ करीबी रिश्तेदार और फिल्म इंडस्ट्री के कुछ गिने-चुने लोग ही मौजूद थे विनोद मेहता लिखते हैं कि उस वक्त मीना कुमारी की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि वो पाई-पाई को मोहताज थीं उन्होंने अपनी सारी कमाई दूसरों पर लुटा दी थी और उनके अपने बैंक अकाउंट खाली पड़े थे

इकतीस मार्च उन्नीस सौ बहत्तर को जब मीना कुमारी ने अपनी आखिरी सांस ली तो एक बहुत बड़ा ड्रामा शुरू हुआ नर्सिंग होम का बिल लगभग पैंतीस सौ रुपये था लेकिन मीना कुमारी के परिवार के पास उस बिल को चुकाने के लिए पैसे ही नहीं थे एक सुपरस्टार की लाश अस्पताल में सिर्फ इसलिए पड़ी रही क्योंकि उसके पास इलाज के पैसे चुकाने की हैसियत नहीं थी विनोद मेहता के मुताबिक मीना कुमारी के बहनोई को इधर-उधर से पैसे मांगकर अस्पताल का वो बिल चुकाना पड़ा तब जाकर उन्हें अस्पताल से बाहर लाया जा सका

यह एक ऐसा सच था जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को शर्मसार कर दिया था जिस पाकीजा को देखने के लिए थियेटर्स के बाहर लोगों की भीड़ टूट रही थी उस पाकीजा की असल जिंदगी इतनी बेबस और लाचार थी बिल चुकाने की जद्दोजहद ने यह साबित कर दिया कि बॉलीवुड की चमक-दमक के पीछे कितना गहरा अंधेरा छुपा होता है उनके अंतिम संस्कार में भले ही हजारों लोग शामिल हुए लेकिन उस दिन मीना कुमारी की अर्थी के साथ इंसानियत और स्टारडम का भी जनाजा उठा था

क्या सच में मौत ही उनके लिए सबसे बड़ा सुकून थी

मीना कुमारी की मौत के बाद फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता उनके जाने से बॉलीवुड ने सिर्फ एक बेहतरीन अदाकारा को नहीं खोया बल्कि उर्दू शायरी के एक शानदार लहजे को भी खो दिया मीना कुमारी ना सिर्फ एक एक्ट्रेस थीं बल्कि नाज के तखल्लुस से बेहद खूबसूरत और दर्द भरी शायरी भी लिखती थीं उनकी कविताएं उनके उस एकांत का आईना थीं जिसे वो दुनिया के सामने कभी जाहिर नहीं कर पाईं

उनके निधन के बाद पाकीजा को देखने के लिए दर्शकों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि फिल्म ने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए लोग पर्दे पर मीना कुमारी को देखकर रोते थे और उनकी कला को सलाम करते थे लेकिन वो ये नहीं जानते थे कि जो महिला पर्दे पर इतनी हसीन लग रही थी वो असल जिंदगी में मौत की दुआएं मांग रही थी कई फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि मीना कुमारी के लिए मौत कोई हादसा नहीं थी बल्कि वो एक लंबी और दर्दनाक प्रक्रिया का अंत था

दर्द का वो आशियाना जो हमेशा के लिए सूना हो गया

मीना कुमारी की कहानी हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम इंसान के रूप में क्या हासिल करना चाहते हैं क्या करोड़ों की दौलत और शोहरत उस शांति को खरीद सकती है जिसकी तलाश हर आत्मा को होती है मीना कुमारी का जीवन एक खुली किताब था लेकिन उस किताब के पन्नों पर सिर्फ और सिर्फ आंसुओं के दाग थे सेंट एलिजाबेथ नर्सिंग होम का वो कमरा आज भी जैसे उस महान अदाकारा की आखिरी सिसकियों की गवाही देता है

विनोद मेहता की किताब हमें उस कड़वे सच का आईना दिखाती है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं एक स्टार जब टूटता है तो उसकी आवाज किसी को सुनाई नहीं देती बस उसकी रोशनी खत्म हो जाती है अस्पताल के उस पैंतीस सौ रुपये के बिल ने मीना कुमारी की पूरी जिंदगी की कमाई का जैसे मजाक उड़ा कर रख दिया था आज जब हम उनकी फिल्में देखते हैं तो उनकी आंखों का वो दर्द और भी गहरा महसूस होता है क्योंकि अब हम उस दर्द की असल कीमत जानते हैं

Sanket Kala

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