सत्तर का दशक भारतीय सिनेमा का वह सुनहरा दौर था, जब हर गली और हर नुक्कड़ पर एक ही आवाज गूंजती थी। घरों के आंगनों में रखे बड़े-बड़े मर्फी और फिलिप्स के रेडियो सेट उस दौर के सबसे पक्के साथी हुआ करते थे। विविध भारती की तरंगों के जरिए एक ऐसी मखमली और दर्द भरी आवाज लोगों के दिलों में उतरती थी, जिसे दुनिया किशोर कुमार के नाम से जानती है। चाय की टपरियों से लेकर कॉलेज के हॉस्टल तक, हर जगह सिर्फ किशोर दा के ही नगमे हवाओं में तैरते रहते थे।
लेकिन फिर अचानक एक दिन वह आवाज रेडियो से पूरी तरह गायब हो गई। श्रोता अपने रेडियो के नॉब घुमाते रहे और उनकी उंगलियां सही फ्रीक्वेंसी तलाशती रहीं। पर उस जादुई आवाज की जगह सिर्फ एक अजीब सी और डरा देने वाली खामोशी ने ले ली थी। यह कोई तकनीकी खराबी नहीं थी, बल्कि आजाद भारत के इतिहास का सबसे खौफनाक राजनीतिक फरमान था।
यह कहानी सिर्फ एक गायक के गानों पर लगे प्रतिबंध की नहीं है। यह उस दौर का दस्तावेज है, जब सत्ता के अहंकार ने कला की स्वतंत्रता को कुचलने की सबसे बड़ी साजिश रची थी। आज के इस लेख में हम उस ऐतिहासिक सच के पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे कि कैसे एक अकेले फनकार ने पूरी सरकार की ताकत को चुनौती दे डाली थी। हम समझेंगे कि क्यों किशोर कुमार का वह मौन उनके गाए हजारों गानों से भी ज्यादा असरदार साबित हुआ।
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वह सुनहरा दौर जब हर धड़कन पर सिर्फ किशोर दा का राज था
उन्नीस सौ सत्तर के दशक की शुरुआत तक किशोर कुमार ने खुद को भारतीय पार्श्व गायन के निर्विवाद बादशाह के रूप में स्थापित कर लिया था। फिल्म आराधना की अभूतपूर्व सफलता ने उन्हें रातों-रात उस मुकाम पर पहुंचा दिया था, जहां पहुंचना हर कलाकार का सिर्फ एक सपना होता है। राजेश खन्ना के सुपरस्टार्डम के पीछे जो सबसे बड़ी ताकत थी, वह किशोर दा की ही आवाज थी। अमर प्रेम से लेकर कटी पतंग और शोले तक, हर बड़ी फिल्म उनके गानों के बिना अधूरी मानी जाती थी।
उस दौर में संगीत निर्देशकों के पास कोई और विकल्प नहीं होता था। आर डी बर्मन और किशोर कुमार की जोड़ी ने पूरे देश को अपने धुनों के जादू में बांध रखा था। उनका रुतबा इतना बड़ा था कि निर्माता उनकी एक तारीख पाने के लिए महीनों तक उनके घर के बाहर इंतजार किया करते थे। किशोर कुमार सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि एक जीता जागता सांस्कृतिक आंदोलन बन चुके थे।
उनके गानों में एक ऐसी कशिश थी जो हर वर्ग और हर उम्र के इंसान को अपना बना लेती थी। चाहे वह कोई रोमांटिक गीत हो या फिर जिंदगी के फलसफे को समझाता कोई गंभीर नगमा, उनकी आवाज हर जज्बात को पर्दे पर जीवंत कर देती थी। यही वह समय था जब उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी और कोई सोच भी नहीं सकता था कि इस आवाज को कभी खामोश किया जा सकता है। लेकिन दिल्ली के सियासी गलियारों में एक ऐसी आंधी पक रही थी जो पूरे देश को अपनी चपेट में लेने वाली थी।
दिल्ली की गलियों से उठी आपातकाल की वो मनहूस आंधी
पच्चीस जून उन्नीस सौ पचहत्तर की वह काली रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे और पूरे देश में एक अजीब सा खौफ फैल गया था। अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई थी और प्रेस की आजादी पर कड़ा पहरा लगा दिया गया था।
इस खौफनाक माहौल में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कमान विद्या चरण शुक्ल के हाथों में सौंपी गई थी। उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वे मीडिया और मनोरंजन जगत को सरकार की मुट्ठी में रखें। सरकार की हर नीति का प्रचार प्रसार करने के लिए रेडियो और टेलीविजन को सबसे बड़ा हथियार बनाया गया। ऑल इंडिया रेडियो जो उस समय मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन था, अब पूरी तरह से सरकारी भोंपू बन चुका था।
संजय गांधी ने उस दौरान अपना बीस सूत्रीय कार्यक्रम लागू किया था। सरकार चाहती थी कि देश के सभी बड़े कलाकार और सितारे इस कार्यक्रम का खुलकर समर्थन करें। योजना यह थी कि बॉलीवुड के सितारों को दिल्ली बुलाकर सरकारी कार्यक्रमों में मुफ्त में प्रस्तुति देने के लिए मजबूर किया जाए। ताकि आम जनता के बीच सरकार की एक सकारात्मक छवि बनाई जा सके और आपातकाल की ज्यादतियों पर पर्दा डाला जा सके।
जब सत्ता के अहंकार से टकराया एक मस्तमौला फनकार
इसी राजनीतिक दबाव के चलते सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के कुछ अधिकारी मुंबई पहुंचे। उन्होंने बॉलीवुड के कई बड़े निर्माताओं और कलाकारों से संपर्क किया और उन्हें दिल्ली में होने वाले एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में हिस्सा लेने का फरमान सुनाया। ज्यादातर लोगों ने डर के मारे बिना किसी विरोध के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। लेकिन असली समस्या तब शुरू हुई जब इन अधिकारियों ने किशोर कुमार से संपर्क करने की कोशिश की।
किशोर कुमार हमेशा से अपने मस्तमौला और बेबाक अंदाज के लिए जाने जाते थे। वे कभी किसी पार्टी या राजनेता के दबाव में काम करने वाले इंसान नहीं थे। जब मंत्रालय के अधिकारियों ने उनके सचिव से बात की और उन्हें दिल्ली आकर मुफ्त में सरकारी गीत गाने का आदेश दिया, तो किशोर दा भड़क गए। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि वे बिना पैसे के कोई गाना नहीं गाएंगे और उन्हें राजनीति से कोई लेना देना नहीं है।
यह जवाब सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के लिए एक करारे तमाचे जैसा था। अधिकारियों ने उन्हें धमकी भी दी कि सरकार के आदेश की नाफरमानी का अंजाम बहुत बुरा हो सकता है। लेकिन उस जिद्दी फनकार ने झुकने से साफ इनकार कर दिया। किशोर कुमार का वह इनकार सिर्फ पैसों का मामला नहीं था, बल्कि वह एक कलाकार का अपनी शर्तों पर जीने का ऐलान था।
और फिर ऑल इंडिया रेडियो पर खामोशी छा गई
किशोर कुमार के इस बेखौफ रवैये से विद्या चरण शुक्ल बुरी तरह से तिलमिला गए। उन्होंने इसे सरकार की तौहीन माना और एक ऐसा फरमान जारी किया जिसने पूरे देश को चौंका दिया। चार मई उन्नीस सौ छिहत्तर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन को एक सख्त आदेश भेजा। आदेश में साफ लिखा था कि किशोर कुमार के गाए हुए किसी भी गाने को अब राष्ट्रीय प्रसारण पर नहीं बजाया जाएगा।
अचानक विविध भारती से किशोर कुमार की आवाज पूरी तरह से गायब हो गई। टीवी पर उनके पुराने गानों के प्रसारण पर भी सख्त रोक लगा दी गई। जिन फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया था या गाने गाए थे, उनका दूरदर्शन पर प्रसारण अनिश्चित काल के लिए टाल दिया गया। सरकार ने कोशिश की कि इस महान कलाकार के अस्तित्व को ही जनता की यादों से मिटा दिया जाए।
श्रोताओं को पहले तो लगा कि शायद कोई तकनीकी खराबी है या किसी विशेष कारण से गाने नहीं बज रहे हैं। लेकिन जब हफ्तों तक उनकी आवाज नहीं सुनाई दी, तो लोगों को इस खतरनाक सच का एहसास हुआ। यह भारतीय कला जगत के लिए एक बहुत बड़ा झटका था और हर कोई इस तानाशाही फैसले से स्तब्ध था। लेकिन सरकार यह भूल गई थी कि कला को कभी भी सरकारी फरमानों की जंजीरों में नहीं बांधा जा सकता।
इस ऐतिहासिक बैन से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने तथ्य जो आज भी हैरान करते हैं
- खौफ का वह आलम ऐसा था कि कई फिल्म निर्माताओं ने अपनी आने वाली फिल्मों से किशोर कुमार की आवाज को हटाना शुरू कर दिया ताकि उनकी फिल्में बैन न हो जाएं।
- जब ऑल इंडिया रेडियो ने उनके गाने बजाने बंद किए, तो भारतीय श्रोताओं ने रेडियो सीलोन की तरफ अपना रुख कर लिया, जहां से उनकी आवाज लगातार गूंजती रही।
- महान रेडियो प्रस्तुतकर्ता अमीन सयानी ने भी इस बैन का अपने तरीके से विरोध किया और बिनाका गीतमाला में किशोर दा के गानों को किसी न किसी बहाने शामिल करने की कोशिश की।
- ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स की बिक्री इस दौरान आसमान छूने लगी, क्योंकि लोग रेडियो पर अपने पसंदीदा गायक को नहीं सुन पा रहे थे, इसलिए वे कैसेट और रिकॉर्ड खरीदने लगे।
- सरकारी अधिकारियों ने बीबीसी को भी एक पत्र भेजकर किशोर कुमार के गाने न बजाने का अनुरोध किया था, जिसे बीबीसी ने सिरे से खारिज कर दिया था।
डर के उस माहौल में बॉलीवुड की रहस्यमयी चुप्पी
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद पहलू वह था जिसे अक्सर भुला दिया जाता है। वह पहलू था पूरी फिल्म इंडस्ट्री की रहस्यमयी और डरी हुई चुप्पी। जब किशोर कुमार पर इतना बड़ा प्रतिबंध लगा, तो उम्मीद थी कि पूरा बॉलीवुड उनके समर्थन में खड़ा होगा। लेकिन आपातकाल के खौफ ने बड़े से बड़े सुपरस्टार और निर्माता की जुबान पर ताला लगा दिया था।
मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर कोई भी खुले तौर पर किशोर दा के समर्थन में बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। कई लोगों ने तो उनसे दूरी बनाना ही बेहतर समझा ताकि वे सरकार की नजरों में न आ जाएं। उस मुश्किल वक्त में किशोर कुमार बिल्कुल अकेले पड़ गए थे, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी शर्तों से समझौता नहीं किया। वे अपने घर में एकांत में समय बिताते रहे और अपने संगीत के रियाज में खोए रहे।
यह चुप्पी दिखाती है कि कैसे डर इंसान को कमजोर बना देता है। लेकिन साथ ही यह किशोर कुमार की उस मानसिक मजबूती को भी दर्शाती है, जिसके दम पर वे अकेले पूरी व्यवस्था से लड़ते रहे। उन्होंने साबित कर दिया कि एक सच्चा कलाकार कभी किसी सत्ता के आगे घुटने नहीं टेक सकता। उनका वह अकेलापन उनके चरित्र की सबसे बड़ी जीत बनकर उभरा।
जब वक्त का पहिया घूमा और गूंज उठी वही जादुई आवाज
वक्त का पहिया कभी एक जगह नहीं रुकता और जुल्म की रात चाहे जितनी लंबी हो, सुबह जरूर होती है। मार्च उन्नीस सौ सतहत्तर में आखिरकार देश से आपातकाल हटा लिया गया। इसके बाद हुए आम चुनावों में जनता ने अपना गुस्सा वोट के जरिए निकाला और सरकार बदल गई। नई सरकार के आते ही सत्ता के उन सभी तानाशाही आदेशों को रद्द कर दिया गया, जिन्होंने लोकतंत्र का गला घोंटा था।
और इसी के साथ ऑल इंडिया रेडियो पर लगी वह मनहूस पाबंदी भी खत्म हो गई। जिस दिन बैन हटा उस दिन विविध भारती पर पहला गाना किशोर कुमार का ही बजाया गया। वह सिर्फ एक गाने का प्रसारण नहीं था, बल्कि वह कला और स्वतंत्रता की जीत का एक शानदार जश्न था। पूरे देश के श्रोताओं ने राहत की सांस ली और अपने चहेते गायक की वापसी का खुले दिल से स्वागत किया।
कला को कैद करने की हर कोशिश का नाकाम होना ही इतिहास है
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो वह दौर एक बुरे सपने जैसा लगता है। लेकिन यह घटना हमें हमेशा यह याद दिलाती रहेगी कि कला और संस्कृति को राजनीतिक ताकत के दम पर कभी नहीं दबाया जा सकता। किशोर कुमार की वह आवाज जिसे कुछ समय के लिए खामोश करने की कोशिश की गई थी, आज दशकों बाद भी करोड़ों दिलों पर राज कर रही है। वे राजनेता और वे सत्ता के गलियारे इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए, लेकिन किशोर दा के गीत आज भी हर महफिल की जान हैं।
यह कहानी सिर्फ एक गायक के संघर्ष की नहीं है, बल्कि यह हर उस आजाद सोच की जीत है जो किसी के सामने झुकने से इनकार कर देती है। किशोर कुमार ने अपनी जिंदगी को हमेशा अपनी शर्तों पर जिया और उनकी यही बेबाकी उनके गानों में भी छलकती है। जब तक इस दुनिया में संगीत रहेगा और जब तक लोगों के दिलों में जज्बात रहेंगे, तब तक किशोर कुमार की वह मखमली आवाज हवाओं में गूंजती रहेगी। और इतिहास हमेशा याद रखेगा कि एक दौर वह भी था जब एक आवाज ने पूरी हुकूमत की नींव हिला दी थी।










