‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ ‘राज’ की अनकही कहानी टॉम क्रूज़ और सैफ के बाद शाहरुख कैसे बने रोमांस के बादशाह

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Shah Rukh Khan and Kajol in a classic DDLJ train scene

नब्बे के दशक का वो दौर जब भारतीय सिनेमा मुख्य रूप से एक्शन और खूनी बदले की कहानियों में उलझा हुआ था, तब एक युवा फिल्म निर्माता के दिमाग में एक ऐसी प्रेम कहानी जन्म ले रही थी जो आने वाले दशकों तक सिनेमाई इतिहास को पूरी तरह से बदलने वाली थी। यह वो समय था जब ना तो ‘राज’ नाम का कोई रोमांटिक हीरो लोगों के दिलों पर राज करता था और ना ही ‘सिमरन’ जैसी कोई लड़की ट्रेन पकड़ने के लिए अपनी आज़ादी के सपने देखती थी। यश राज फिल्म्स के शांत गलियारों में एक नई स्क्रिप्ट करवट ले रही थी जिसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह भारतीय सिनेमा की सबसे लंबी चलने वाली फिल्म बन जाएगी। आज जब हम इस फिल्म को देखते हैं तो शाहरुख खान के बिना राज मल्होत्रा की कल्पना करना भी असंभव सा लगता है, लेकिन यह जानकर आपको हैरानी होगी कि शाहरुख इस ऐतिहासिक किरदार के लिए पहली पसंद थे ही नहीं।

यह सिर्फ एक ब्लॉकबस्टर फिल्म के पर्दे पर उतरने की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी अद्भुत सिनेमाई यात्रा है जो हमें बताती है कि कैसे एक हॉलीवुड सुपरस्टार के लिए लिखी गई कहानी किस्मत के पन्नों से होते हुए शाहरुख खान तक पहुंची। इस लेख में हम आदित्य चोपड़ा की किताब ‘मेकिंग ऑफ डीडीएलजे‘ के पन्नों को गहराई से पलटेंगे और जानेंगे उन शुरुआती संघर्षों, रिजेक्शन और पर्दे के पीछे की उन अनकही कहानियों को जिन्होंने एक साधारण सी इंडो-अमेरिकन स्क्रिप्ट को भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा और अमर महाकाव्य बना दिया।

हॉलीवुड का वो अधूरा ख्वाब और टॉम क्रूज़ की दस्तक

आदित्य चोपड़ा जब पहली बार इस फिल्म की कहानी लिख रहे थे, तो उनके ज़ेहन में एक ठेठ भारतीय प्रेम कहानी नहीं बल्कि एक ग्लोबल रोमांस का ताना-बाना था। उनके युवा मन में एक ऐसी कहानी आकार ले रही थी जो सरहदों के पार का सफर तय करने वाली थी, एक ऐसी कहानी जिसका नायक एक हॉलीवुड सुपरस्टार होने वाला था। आदित्य चाहते थे कि इस फिल्म का मुख्य किरदार एक असली अमेरिकी लड़का हो जो एक भारतीय लड़की के प्यार में पड़ जाता है और फिर उसे पाने के लिए भारत के सांस्कृतिक चक्रव्यूह में प्रवेश करता है।

इस इंडो-अमेरिकन प्रेम कहानी के लिए आदित्य चोपड़ा की सबसे पहली और इकलौती पसंद कोई और नहीं बल्कि हॉलीवुड के सबसे बड़े सुपरस्टार टॉम क्रूज़ थे। आदित्य का मानना था कि टॉम क्रूज़ का आकर्षण और उनका वैश्विक स्टारडम इस फिल्म को दुनिया भर में एक नई पहचान दिलाएगा और यह भारतीय सिनेमा के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने इस विचार को लेकर काफी गंभीरता से काम भी शुरू कर दिया था और टॉम क्रूज़ को ध्यान में रखते हुए ही कहानी के शुरुआती ड्राफ्ट तैयार किए जा रहे थे।

लेकिन जब आदित्य ने अपने इस महत्वाकांक्षी हॉलीवुड सपने को अपने पिता और दिग्गज फिल्म निर्माता यश चोपड़ा के सामने रखा, तो उन्हें एक बहुत बड़ी निराशा का सामना करना पड़ा। यश चोपड़ा ने इस इंडो-अमेरिकन विचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि भारतीय दर्शक एक विदेशी नायक के साथ भावनात्मक रूप से कभी नहीं जुड़ पाएंगे। यश चोपड़ा की सलाह साफ थी कि अगर इस प्रेम कहानी को अमर बनाना है, तो इसका नायक ऐसा होना चाहिए जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो और जिसमें भारत की मिट्टी की महक हो।

नवाब सैफ अली खान और लंदन के उस एनआरआई लड़के की तलाश

पिता की सलाह के बाद आदित्य चोपड़ा ने स्क्रिप्ट में अहम बदलाव किए और नायक को एक अमेरिकी नागरिक से बदलकर एक अनिवासी भारतीय यानी एनआरआई बना दिया। अब तलाश थी एक ऐसे भारतीय चेहरे की जो लंदन में पले-बढ़े एक अमीर, बिगड़ैल लेकिन दिल से सच्चे लड़के के किरदार को परदे पर जीवंत कर सके। बॉलीवुड के पारंपरिक नायकों में वो बात नज़र नहीं आ रही थी जो इस आधुनिक राज मल्होत्रा के लिए चाहिए थी।

इसी तलाश के दौरान आदित्य चोपड़ा की नज़र नवाब सैफ अली खान पर पड़ी जो उस समय इंडस्ट्री में अपनी एक नई पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे। सैफ की परवरिश और उनकी पढ़ाई-लिखाई इंग्लैंड में हुई थी, जिसके कारण उनके बात करने के तरीके और उनके हाव-भाव में एक स्वाभाविक विदेशी और अंग्रेजी लहजा था। आदित्य को लगा कि सैफ अली खान बिना किसी खास मेहनत के लंदन के उस अमीर लड़के के किरदार में पूरी तरह फिट बैठ सकते हैं क्योंकि वो असल ज़िंदगी में भी कुछ वैसे ही थे।

फिल्म के शुरुआती दौर में सैफ अली खान से इस किरदार को लेकर काफी लंबी बातचीत भी हुई थी और ऐसा माना जा रहा था कि सैफ ही इस फिल्म के नायक होंगे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, क्योंकि कुछ अज्ञात कारणों और तारीखों की समस्या के चलते सैफ अली खान और यश राज फिल्म्स के बीच बात नहीं बन पाई। सैफ के इस प्रोजेक्ट से अलग होने के बाद राज मल्होत्रा का किरदार एक बार फिर से किसी ऐसे चेहरे की तलाश में था जो इसे इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज कर सके।

डर और बाज़ीगर का वो खलनायक जिसे बनना था ‘राज’

सैफ अली खान के जाने के बाद आदित्य चोपड़ा का ध्यान शाहरुख खान की तरफ गया जो उस समय रोमांस नहीं बल्कि अपनी खलनायकी के लिए पूरे देश में मशहूर हो चुके थे। यह वो दौर था जब शाहरुख खान ‘डर’ और ‘बाज़ीगर’ जैसी फिल्मों में अपने नकारात्मक और जुनूनी किरदारों से रातों-रात सुपरस्टार बन चुके थे। उनके बाल बिखरे हुए होते थे, आंखों में एक सनक होती थी और दर्शक उन्हें एक खूंखार विलेन के रूप में देखने के आदी हो चुके थे।

जब आदित्य चोपड़ा ने शाहरुख खान को एक सॉफ्ट रोमांटिक फिल्म का प्रस्ताव दिया, तो शाहरुख पूरी तरह से हैरान रह गए और उन्होंने शुरुआत में इस प्रस्ताव को खास तवज्जो नहीं दी। शाहरुख का मानना था कि उनका चेहरा और उनका अंदाज़ एक टिपिकल लवर बॉय जैसा बिल्कुल नहीं है और दर्शक उन्हें एक फूल लेकर प्यार का इज़हार करते हुए कभी स्वीकार नहीं करेंगे। शाहरुख उस समय एक्शन और थ्रिलर फिल्में करने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे थे और उन्हें लगता था कि रोमांस उनके करियर के लिए एक बहुत बड़ा जोखिम साबित हो सकता है।

शाहरुख ने लगातार कई बार आदित्य चोपड़ा की इस कहानी को टालने की कोशिश की और सीधे तौर पर ‘ना’ कहने के बजाय वो स्क्रिप्ट सुनने के बाद कोई स्पष्ट जवाब नहीं देते थे। आदित्य चोपड़ा भी अपनी जिद के पक्के थे और उन्होंने ठान लिया था कि अगर राज मल्होत्रा का किरदार कोई निभाएगा, तो वो सिर्फ और सिर्फ शाहरुख खान ही होंगे। यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक लड़ाई थी जिसमें एक निर्देशक अपने अभिनेता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था कि वो एक खलनायक नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा प्रेमी बन सकता है।

करण अर्जुन के सेट से लेकर मन्नत तक का वो अनवरत संघर्ष

शाहरुख खान की हिचकिचाहट को दूर करने के लिए आदित्य चोपड़ा ने एक ऐसा रास्ता अपनाया जो बॉलीवुड के इतिहास में शायद ही किसी निर्देशक ने अपनाया हो। वो लगातार शाहरुख खान का पीछा करने लगे और जहां भी शाहरुख शूटिंग करते थे, आदित्य वहां पहुंच जाते थे ताकि उन्हें इस फिल्म के लिए राजी कर सकें। चाहे वो राकेश रोशन की फिल्म ‘करण अर्जुन’ का सेट हो या फिर मुकुल आनंद की ‘त्रिमूर्ति’ की शूटिंग का लोकेशन, आदित्य चोपड़ा साये की तरह शाहरुख के साथ-साथ रहने लगे।

एक बार ‘त्रिमूर्ति’ के सेट पर जब शाहरुख अपना एक बहुत ही मुश्किल एक्शन सीन शूट कर रहे थे, तब ब्रेक के दौरान आदित्य उनके पास गए और एक बहुत ही गहरी बात कही। आदित्य ने शाहरुख की आंखों में देखते हुए कहा कि जब तक तुम पर्दे पर प्यार नहीं करोगे, तब तक तुम इस देश के सबसे बड़े सुपरस्टार कभी नहीं बन पाओगे। आदित्य ने शाहरुख को समझाया कि उनकी आंखों में एक ऐसा जादू है जो नफरत से ज्यादा प्यार को बयां कर सकता है और यही जादू उन्हें दुनिया का सबसे बड़ा स्टार बनाएगा।

इन मुलाकातों के बावजूद शाहरुख खान लगभग तीन हफ्ते तक कोई भी फैसला नहीं ले पाए और वो लगातार असमंजस की स्थिति में फंसे हुए थे। वो यश चोपड़ा का बहुत सम्मान करते थे इसलिए वो सीधे तौर पर इस प्रोजेक्ट को मना भी नहीं कर पा रहे थे, लेकिन उनके भीतर का डर उन्हें ‘हां’ कहने से भी रोक रहा था। आदित्य चोपड़ा का ये संघर्ष किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था जहां एक क्रिएटर अपने ही बनाए किरदार के लिए सबसे बेहतरीन कैनवस को राजी करने की जद्दोजहद कर रहा था।

वो ऐतिहासिक पल जब शाहरुख ने आखिरकार कहा ‘हां’

महीनों की मशक्कत और लगातार पीछा करने के बाद आखिरकार वो दिन आ ही गया जब भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक बहुत बड़ा पन्ना लिखा जाने वाला था। शाहरुख खान को इस बात का अहसास होने लगा था कि यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा उन पर एक ऐसा दांव लगा रहे हैं जो शायद वो खुद पर भी नहीं लगा सकते थे। यश चोपड़ा ने भी शाहरुख को एक पिता की तरह समझाया और कहा कि अगर वो हमेशा एक्शन और निगेटिव रोल करते रहेंगे तो उनकी छवि कभी भी एक संपूर्ण अभिनेता की नहीं बन पाएगी।

एक शाम शाहरुख खान ने आदित्य चोपड़ा को मिलने के लिए बुलाया और एक लंबी खामोशी के बाद आखिरकार उन्होंने इस फिल्म के लिए अपनी रजामंदी दे दी। शाहरुख का वो ‘हां’ कहना सिर्फ एक फिल्म साइन करना नहीं था, बल्कि वो एक ऐसे युग की शुरुआत थी जिसने भारतीय युवाओं को प्यार करने का एक नया सलीका सिखाया। जैसे ही शाहरुख ने इस किरदार को अपनाया, उन्होंने राज मल्होत्रा के अंदर अपनी खुद की ऊर्जा, अपना सेंस ऑफ ह्यूमर और अपनी वो चिर-परिचित मुस्कान डाल दी जिसने इस किरदार को अमर कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि शाहरुख खान ने राज के किरदार में कई ऐसे बदलाव भी किए जो मूल स्क्रिप्ट में नहीं थे, जिससे यह किरदार और भी ज्यादा प्रामाणिक और प्यारा बन गया। उन्होंने अपनी वास्तविक जिंदगी के कई छोटे-छोटे हाव-भाव और अपने दिल्ली वाले अंदाज़ को राज के चरित्र में इस तरह से पिरोया कि दर्शक ये भूल ही गए कि वो किसी पर्दे के नायक को देख रहे हैं। शाहरुख खान का यह ट्रांसफॉर्मेशन इतना जादुई था कि कुछ ही महीनों में ‘डर’ का वो खूंखार खलनायक पूरे देश का नेशनल क्रश बन गया।

पर्दे के पीछे की वो बातें जो आज भी एक रहस्य हैं

फिल्म के निर्माण के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने अनजाने में ही इस फिल्म को एक क्लासिक का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाई। आइए नज़र डालते हैं उन अनसुने किस्सों पर जो ‘मेकिंग ऑफ डीडीएलजे’ की किताब में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं

  • किरण खेर का वो जादुई सुझाव: शुरुआत में इस फिल्म का नाम कुछ और ही सोचा जा रहा था, लेकिन यह अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर थीं जिन्होंने पुरानी फिल्म के एक गाने से प्रेरणा लेकर ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ नाम सुझाया था
  • उदय चोपड़ा की वो मशहूर जैकेट: राज मल्होत्रा की वो आइकॉनिक काली हार्ले डेविडसन जैकेट जो शाहरुख ने फिल्म में पहनी थी, उसे दरअसल आदित्य चोपड़ा के छोटे भाई उदय चोपड़ा ने कैलिफोर्निया के एक स्टोर से खरीदा था
  • पलट वाला वो ऐतिहासिक सीन: शाहरुख खान का वो मशहूर ‘पलट पलट पलट’ वाला सीन हॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड की फिल्म ‘इन द लाइन ऑफ फायर’ के एक डायलॉग से प्रेरित होकर लिखा गया था
  • मेहंदी लगा के रखना का असली सफर: यह ब्लॉकबस्टर गाना मूल रूप से यश चोपड़ा की किसी और फिल्म के लिए संगीतकार जतिन-ललित ने बनाया था, लेकिन आदित्य को यह इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे डीडीएलजे के लिए मांग लिया
  • अमरीश पुरी का वो अंतिम संवाद: क्लाइमैक्स में जब अमरीश पुरी कहते हैं ‘जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी’, तो इस संवाद को लिखने में महीनों का समय लगा था क्योंकि आदित्य एक ऐसा डायलॉग चाहते थे जो सदियों तक याद रखा जाए

भारतीय सिनेमा पर वो अमिट छाप और एक युग का अंतहीन सफर

20 अक्टूबर 1995 को जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, तो इसने जो इतिहास रचा उसकी कल्पना खुद इसके निर्माताओं ने भी कभी नहीं की थी। फिल्म ने ना सिर्फ बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, बल्कि इसने भारतीय समाज में प्यार, परिवार और बगावत को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया। इस फिल्म ने पहली बार यह सिखाया कि प्यार करने के लिए परिवार से बगावत करके भागने की जरूरत नहीं है, बल्कि प्यार वो है जो अपनों का दिल जीतकर हासिल किया जाए।

मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमाघर में इस फिल्म ने लगातार पच्चीस साल से ज्यादा चलने का जो विश्व रिकॉर्ड बनाया है, वो शायद ही दुनिया की कोई और फिल्म कभी तोड़ पाएगी। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ ने बॉलीवुड रोमांस को एक ऐसा व्याकरण दिया जिसका पालन आज तक कई फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों में करते आ रहे हैं। इस फिल्म ने शाहरुख खान को जो मुकाम दिया, उसने उन्हें रातों-रात भारतीय सिनेमा का निर्विवाद ‘किंग ऑफ रोमांस’ बना दिया, एक ऐसा ताज जो आज तक उनके ही सिर पर सजा है।

हर पीढ़ी के युवा इस फिल्म को देखकर प्यार करना सीखते हैं और हर लड़की के दिल में आज भी कहीं ना कहीं एक ऐसे ही राज मल्होत्रा की तस्वीर बसी होती है जो उसके लिए सात समंदर पार से आएगा। इस फिल्म ने भारतीय संस्कृति और पश्चिमी जीवनशैली के बीच एक ऐसा खूबसूरत पुल बनाया जिसने विदेश में बसे हर भारतीय को अपनी मिट्टी से दोबारा जुड़ने का एक बहुत ही प्यारा बहाना दे दिया।

एक प्रेम कहानी जो समय के पार चली गई

शायद यह नियति का ही एक बहुत बड़ा खेल था कि जो कहानी सात समंदर पार एक अमेरिकी अभिनेता टॉम क्रूज़ के लिए लिखी गई थी, वो मुंबई की सड़कों पर संघर्ष कर रहे एक दिल्ली के लड़के के नाम पर मुकम्मल हुई। आदित्य चोपड़ा का वो अडिग विश्वास और शाहरुख खान की वो झिझकती हुई ‘हां’, इन दोनों ने मिलकर एक ऐसा चमत्कार किया जिसने सिनेमा के कैनवस पर प्यार का सबसे खूबसूरत चित्र उकेरा। आज जब हम मुड़कर देखते हैं, तो यह सोचना भी सिहरन पैदा कर देता है कि अगर टॉम क्रूज़ या सैफ अली खान ने इस फिल्म को किया होता तो क्या हम कभी वो जादू महसूस कर पाते जो शाहरुख और काजोल ने पर्दे पर रचा था। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ सिर्फ एक फिल्म का नाम नहीं है, यह एक एहसास है, एक पुरानी शराब है जिसका नशा समय बीतने के साथ-साथ और भी गहरा होता जा रहा है और शायद हमेशा होता रहेगा।

Sanket Kala

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