भारतीय सिनेमा के सुनहरे इतिहास में जब भी भव्यता और कला के सबसे बेहतरीन तालमेल का जिक्र होता है तो सबसे पहला नाम संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास का आता है। साल दो हजार दो में रिलीज हुई यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं थी बल्कि यह पर्दे पर उकेरी गई एक ऐसी कविता थी जिसे हर कोई अपनी आंखों में बसा लेना चाहता था। शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित के अद्भुत अभिनय से सजी इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को दुनिया भर में एक नई और शानदार पहचान दिलाई थी।
इस चमचमाती सफलता और भव्यता के पीछे एक ऐसा खौफनाक सच छिपा है जिसे आज भी बहुत कम लोग जानते हैं या समझ पाते हैं। जो भव्य और विशाल सेट दर्शकों को किसी सपनों की दुनिया जैसा लगता था वो एक दिन अचानक भयानक आग की लपटों में घिर कर श्मशान में तब्दील हो गया था। यह सिर्फ एक फिल्म की सामान्य शूटिंग नहीं थी बल्कि यह एक जुनूनी निर्देशक की ऐसी कठिन परीक्षा थी जहां उसका सब कुछ जलकर राख हो चुका था।
यह कहानी जानना आज के समय में इसलिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ एक फिल्म के बनने या बिगड़ने की आम दास्तान बिल्कुल नहीं है। यह कहानी है उस अकल्पनीय संघर्ष की जहां एक तरफ फिल्म के मुख्य फाइनेंसर जेल की हवा खा रहे थे और दूसरी तरफ करोड़ों रुपये का सेट धू-धू कर जल रहा था। आज हम आपको देवदास के सेट पर लगी उस आग का पूरा इनसाइड सच बताएंगे जिसने इस ऐतिहासिक मास्टरपीस को हमेशा के लिए डिब्बे में बंद होने की कगार पर ला खड़ा किया था।
एक भव्य सपने की नींव और संजय लीला भंसाली का पागलपन
संजय लीला भंसाली हमेशा से अपनी फिल्मों में एक ऐसा जादुई संसार रचने के लिए जाने जाते हैं जो आम जिंदगी की हकीकत से बहुत परे होता है। देवदास उनके लिए सिर्फ एक फिल्मी प्रोजेक्ट नहीं था बल्कि यह उनका वो सबसे अज़ीज़ सपना था जिसे वो सालों से अपनी आंखों में संजो कर बैठे थे। इस फिल्म के लिए उन्होंने पानी की तरह बेशुमार पैसा बहाया और एक ऐसा विशाल सेट तैयार करवाया जिसकी कल्पना करना भी उस दौर के निर्देशकों के लिए नामुमकिन था।
फिल्म में पारो की हवेली हो या चंद्रमुखी का कोठा हर एक छोटी से छोटी चीज को बेहद बारीकी से तराशा और सजाया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि पारो की हवेली के लिए करोड़ों रुपये खर्च करके लाखों रंगीन कांच के टुकड़े मंगवाए गए थे जो बारिश के पानी में भी खराब न हों। वहीं चंद्रमुखी का भव्य कोठा बनाने के लिए भी इतनी दौलत खर्च की गई थी जिसे देखकर इंडस्ट्री के बड़े-बड़े दिग्गज हैरान रह जाते थे।
दिग्गज कलाकारों के भारी-भरकम लिबास से लेकर सेट के हर एक अंधेरे कोने तक सिर्फ और सिर्फ परफेक्शन की ही मांग की गई थी। उस दौर में इस महात्वाकांक्षी फिल्म का बजट लगभग पचास करोड़ रुपये के पार पहुंच गया था जो भारतीय सिनेमा के लिए एक बहुत बड़ा जोखिम माना जा रहा था। भंसाली का जुनून अपने चरम पर था और वो अपनी इस फिल्म की गुणवत्ता के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे।
यह वो वक्त था जब सेट पर दिन-रात सैकड़ों मजदूर काम करते थे और हर तरफ सिर्फ देवदास की ही चर्चा होती थी। ऐसा लग रहा था मानो मुंबई के बीचों-बीच एक नया शहर बसा दिया गया हो जहां सिर्फ देवदास की प्रेम कहानी सांस ले रही थी। लेकिन कोई नहीं जानता था कि इस कृत्रिम शहर की नींव पर जल्द ही एक बहुत बड़ा खतरा मंडराने वाला है।
जब कैमरे के पीछे छा गया था विवादों का काला साया
देवदास की शूटिंग अभी अपने पूरे शबाब पर ही पहुंची थी कि फिल्म पर एक ऐसा ग्रहण लगा जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री में हड़कंप मचा दिया। फिल्म के सबसे बड़े फाइनेंसर भरत शाह को किसी मामले में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था और इस खबर ने रातों-रात देवदास के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया। हर तरफ यही चर्चा होने लगी थी कि अब यह फिल्म कभी पूरी नहीं हो पाएगी और संजय लीला भंसाली का यह भव्य सपना हमेशा के लिए अधूरा ही रह जाएगा।
फंडिंग पूरी तरह से रुक जाने के कारण सेट पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों और टेक्नीशियनों के पैसे अचानक अटक गए थे। यह वो मुश्किल दौर था जब संजय लीला भंसाली भयंकर मानसिक तनाव से गुजर रहे थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो इस भयानक मुसीबत से कैसे बाहर निकलें। कई बड़े वितरकों ने भी डर के मारे फिल्म से अपने हाथ पीछे खींच लिए थे क्योंकि कोई भी इतने बड़े विवादित प्रोजेक्ट में अपना पैसा नहीं फंसाना चाहता था।
ऐसे मुश्किल और तनावपूर्ण वक्त में सुपरस्टार शाहरुख खान और फिल्म की बाकी स्टारकास्ट ने भंसाली का पूरा साथ दिया और बिना पैसों की परवाह किए अपनी शूटिंग जारी रखी। भंसाली ने भी किसी कीमत पर हार नहीं मानी और अपने इस मास्टरपीस को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन उन सभी को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उनकी जिंदगी की असली तबाही तो अभी आनी बाकी है।
सेट पर माहौल पहले से ही काफी भारी था और हर कोई बस किसी तरह इस फिल्म को पूरा करने की दुआ कर रहा था। वित्तीय संकट ने पूरे क्रू की कमर तोड़ कर रख दी थी लेकिन कैमरे के सामने कलाकारों की ऊर्जा में कोई कमी नहीं आई थी। इसी संघर्ष के बीच एक ऐसी मनहूस घड़ी आई जिसने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
वो मनहूस शाम जब देवदास का सेट श्मशान बन गया
सब कुछ धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहा था और टीम ने राहत की सांस लेना शुरू ही किया था कि तभी एक शाम कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी टीम की रूह कंपा दी। शूटिंग के दौरान सेट के एक हिस्से में अचानक भयंकर आग लग गई जिसने पल भर में ही सब कुछ अपनी चपेट में ले लिया। आग की लपटें इतनी भयानक थीं कि किसी को कुछ सोचने या समझने का मौका ही नहीं मिला और करोड़ों का सेट चंद मिनटों में धू-धू कर जलने लगा।
इस आग की लपटें इतनी ज्यादा ऊंची थीं कि मीलों दूर से इन्हें साफ-साफ देखा जा सकता था और सेट पर पूरी तरह अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया था। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे और भंसाली अपनी ही आंखों के सामने अपना सालों का सपना राख में तब्दील होते हुए देख रहे थे। यह आग शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी थी लेकिन इसने जो तबाही मचाई वो भंसाली के लिए किसी खौफनाक बुरे सपने से कम नहीं थी।
इस दर्दनाक हादसे में न सिर्फ करोड़ों रुपये का भारी आर्थिक नुकसान हुआ बल्कि सेट पर काम करने वाले कुछ लोगों की जान भी चली गई। यह देवदास की पूरी टीम के लिए सबसे बड़ा और गहरा सदमा था क्योंकि जिस फिल्म को वो इतनी शिद्दत से बना रहे थे वो अब मौत का खौफनाक मंजर बन चुकी थी। आग बुझने के बाद जब पुलिस और भंसाली ने सेट का मुआयना किया तो वहां सिर्फ और सिर्फ राख और बर्बादी के काले निशान बाकी थे।
उस दिन की आग ने सिर्फ लकड़ियों और पर्दों को नहीं जलाया था बल्कि उसने एक फिल्म निर्माता के आत्मविश्वास को भी बुरी तरह झुलसा दिया था। सेट पर मौजूद भारी मात्रा में पेंट और लकड़ी के कारण आग ने इतना विकराल रूप लिया था कि फायर ब्रिगेड को भी उसे बुझाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी।
आग के बाद का सन्नाटा और बिखरे हुए हौसले
उस दिन आग बुझने के बाद सेट पर पसरा खौफनाक सन्नाटा चीख-चीख कर भंसाली की बर्बादी की गवाही दे रहा था। इस दर्दनाक हादसे ने संजय लीला भंसाली को अंदर से पूरी तरह तोड़ कर रख दिया था और वो कुछ समय के लिए गहरे डिप्रेशन में चले गए थे। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि उनकी यह फिल्म बुरी तरह शापित है और शायद ऊपर वाला भी नहीं चाहता कि यह कहानी कभी रूपहले पर्दे पर उतरे।
इंडस्ट्री के कई शुभचिंतकों ने उन्हें यह सलाह दी कि अब इस फिल्म को यहीं रोक देना चाहिए क्योंकि इसमें आगे बढ़ना सिर्फ और सिर्फ बर्बादी को दावत देना है। फाइनेंसर के जेल जाने के बाद किसी तरह जो थोड़ा बहुत काम शुरू हुआ था वो अब इस भयानक आग के कारण पूरी तरह से स्वाहा हो चुका था। खुद भंसाली भी लगभग यह मान चुके थे कि अब देवदास का सफर हमेशा के लिए यहीं खत्म हो गया है और वो इसे कभी दुनिया को नहीं दिखा पाएंगे।
हर तरफ से सिर्फ निराशाजनक बातें ही सुनने को मिल रही थीं और मीडिया में भी फिल्म के बंद होने की खबरें छपने लगी थीं। लेकिन एक सच्चा कलाकार कभी अपनी कला को इतनी आसानी से मरने नहीं देता और भंसाली के अंदर का वो कलाकार अभी भी कहीं न कहीं जिंदा था।
राख से उठने की कहानी: देवदास के सेट से जुड़े अनसुने तथ्य
देवदास का यह पूरा सफर आग और आंसुओं के समंदर से होकर गुजरा था लेकिन इसकी मेकिंग से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो आज भी सिने प्रेमियों को हैरान कर देती हैं। आइए जानते हैं इस भव्य फिल्म के निर्माण और उस भयानक हादसे से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुके हैं-
- आग लगने के बाद राख हुए सेट को दोबारा बनाने में कई महीनों का लंबा समय लगा और इसके लिए देश भर से कारीगरों को वापस काम पर बुलाया गया था
- जिस वक्त आग लगी थी उस समय सेट पर भारी मात्रा में ज्वलनशील पदार्थ मौजूद थे जिसकी वजह से छोटी सी चिंगारी ने इतना विकराल रूप ले लिया था
- इस भयानक हादसे के बाद फिल्म के बजट में अप्रत्याशित रूप से भारी इजाफा हो गया था और इसे पूरा करने के लिए निर्देशकों को कई तरह के वित्तीय समझौते करने पड़े थे
- शाहरुख खान ने इस मुश्किल और तनावपूर्ण वक्त में सेट पर मौजूद लोगों का जमकर हौसला बढ़ाया और खुद एक सच्चे लीडर की तरह ढाल बनकर खड़े रहे
- देवदास के विशाल सेट को रोशन करने के लिए इतने ज्यादा जनरेटर का इस्तेमाल किया गया था जिनसे एक छोटे शहर को आसानी से बिजली दी जा सकती थी
- आग के इस भयानक खौफ से बाहर आने के लिए पूरी टीम को कई हफ्तों तक कड़ी काउंसलिंग और मानसिक सपोर्ट की बहुत ज्यादा जरूरत पड़ी थी
- भरत शाह के विवाद और आग लगने की इस दुखद घटना के कारण यह फिल्म रिलीज से पहले ही उस साल की सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली फिल्म बन गई थी
एक जिद जिसने रचा इतिहास और सिनेमा की अमर धरोहर
तमाम बड़ी मुश्किलों और दर्दनाक हादसों के बावजूद संजय लीला भंसाली की वो अड़ियल जिद आखिर रंग लाई और उन्होंने अपनी देवदास को पूरा करके ही दम लिया। जब यह बहुप्रतीक्षित फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों ने इसे पलकों पर बिठा लिया और सिनेमाघरों के बाहर टिकट पाने के लिए लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। इस फिल्म ने सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर ही पैसों की बारिश नहीं की बल्कि लोगों के दिलों पर भी राज किया और भारतीय सिनेमा की भव्यता की एक नई परिभाषा गढ़ी।
देवदास को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया गया जहां इसे भारी स्टैंडिंग ओवेशन मिला और दुनिया भर के बड़े क्रिटिक्स ने इसकी जमकर तारीफ की। शाहरुख खान की उम्दा और दर्द भरी एक्टिंग हो या ऐश्वर्या और माधुरी का बेहतरीन डांस हर एक चीज ने दर्शकों को अपना दीवाना बना लिया था। आग और विवादों की काली राख से उठकर इस फिल्म ने जो ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की वो आज भी नई जनरेशन के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है।
इस फिल्म ने उस साल राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर फिल्मफेयर तक हर बड़े मंच पर अपना डंका बजाया और भंसाली को भारतीय सिनेमा के सबसे महान निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया। आज भी जब पीरियड ड्रामा और भव्य फिल्मों की बात होती है तो देवदास को एक ऊंचे बेंचमार्क के तौर पर देखा जाता है जिसे पार करना हर किसी के बस की बात बिल्कुल नहीं है।
फिल्म के हर एक फ्रेम में वो मेहनत और दर्द साफ झलकता है जो इसे बनाने वाली टीम ने बरसों तक झेला था। दर्शकों ने इस फिल्म को सिर्फ देखा नहीं बल्कि इसे महसूस किया और इसे भारतीय सिनेमा के अमर क्लासिक्स की सूची में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया।
सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि जुनून की एक अमर गाथा
देवदास का यह मुश्किल सफर हमें यह सिखाता है कि जब कोई बड़ा सपना आपके दिल की गहराइयों में उतर जाए तो उसे कोई भी आग कभी जला नहीं सकती। संजय लीला भंसाली ने अपने विजन और अपनी कला को बचाने के लिए जो संघर्ष किया वो सिनेमा के हर छात्र के लिए एक बहुत बड़ा और जरूरी सबक है। यह फिल्म सिर्फ एक शराबी प्रेमी की कहानी नहीं थी बल्कि यह एक कलाकार की उस तड़प की कहानी थी जो अपनी कला के लिए किसी भी हद तक जाने को पूरी तरह तैयार था।
आज जब हम बड़े पर्दे या टीवी पर देवदास की भव्यता को निहारते हैं तो हमें उन गुमनाम मजदूरों और कलाकारों की मेहनत का भी पूरा सम्मान करना चाहिए जिन्होंने उस राख से इस महल को दोबारा अपने पसीने से खड़ा किया। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के माथे पर सजी वो खूबसूरत बिंदी है जिसकी चमक वक्त गुजरने के साथ और भी ज्यादा गहरी और सुनहरी होती जा रही है। देवदास का यह किस्सा हमेशा हमें याद दिलाता रहेगा कि सच्चे जुनून के आगे बड़ी से बड़ी मुसीबत को भी एक दिन घुटने टेकने ही पड़ते हैं और जीत हमेशा कला की ही होती है।







