अक्षय कुमार की अनकही कहानी बैंकॉक की गलियों में बर्तन धोने से लेकर बॉलीवुड का खिलाड़ी बनने तक का सफर

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Akshay Kumar Biography

बैंकॉक की वो गर्म रातें और एक गुमनाम लड़के के बड़े सपने

साल उन्नीस सौ अस्सी का वह दशक जब थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक की सड़कें आधी रात को भी गुलजार रहा करती थीं और इन्हीं सड़कों के किनारे एक छोटे से रेस्टोरेंट में एक नौजवान लड़का पसीने से लथपथ होकर बर्तन धो रहा था। उस लड़के की आंखों में नींद जरूर थी लेकिन उसके सपनों में एक ऐसी चमक थी जिसे कोई भी मुश्किल बुझा नहीं सकती थी। वह लड़का कोई और नहीं बल्कि दिल्ली के चांदनी चौक की गलियों से निकला राजीव भाटिया था जिसे आज पूरी दुनिया बॉलीवुड के सबसे बड़े सुपरस्टार अक्षय कुमार के नाम से जानती है।

यह कहानी सिर्फ एक आम इंसान के मशहूर होने की नहीं है बल्कि यह उस अटूट विश्वास और कड़ी मेहनत की दास्तान है जो हर उस इंसान को जाननी चाहिए जो जिंदगी में कुछ बड़ा करना चाहता है। आज हम उस खिलाड़ी के जीवन के पन्नों को पलटेंगे जिन्हें देखकर आप समझ पाएंगे कि कैसे बैंकॉक की छोटी सी रसोई में काम करने वाला एक आम वेटर भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सितारा बन गया। इस सफर में दर्द भी है, संघर्ष भी है और किस्मत का वो खेल भी है जिसने रातों-रात राजीव भाटिया की दुनिया को पूरी तरह से बदल कर रख दिया।

चांदनी चौक की तंग गलियों से लेकर कोलीवाड़ा तक का सफर

राजीव भाटिया का जन्म अमृतसर में हुआ था लेकिन उनके बचपन का एक बहुत बड़ा हिस्सा दिल्ली के चांदनी चौक की तंग और पुरानी गलियों में बीता था। एक साधारण पंजाबी परिवार में जन्मे राजीव हमेशा से पढ़ाई-लिखाई में कुछ खास अच्छे नहीं थे लेकिन खेलों और शारीरिक गतिविधियों में उनकी ऊर्जा देखने लायक होती थी। उनके पिता ओम भाटिया एक आर्मी अफसर थे और बाद में उन्होंने यूनिसेफ के लिए काम किया जिसके कारण परिवार को मुंबई के कोलीवाड़ा इलाके में शिफ्ट होना पड़ा।

मुंबई की उस नई जिंदगी ने राजीव को बहुत कुछ सिखाया क्योंकि यहां के छोटे से घर में रहते हुए उन्होंने संघर्ष के असली मायने समझे थे। स्कूल के दिनों में जब भी राजीव के पिता उनसे उनके भविष्य के बारे में पूछते थे तो वह मासूमियत से कहते थे कि वह बस एक हीरो बनना चाहते हैं। उनके पिता ने कभी अपने बेटे के इस सपने का मजाक नहीं उड़ाया बल्कि उन्होंने हमेशा राजीव को अपनी फिटनेस और मार्शल आर्ट्स पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया ताकि वह जिंदगी की चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें।

जब मार्शल आर्ट्स के जुनून ने पहुंचाया बैंकॉक की अजनबी सड़कों पर

जैसे-जैसे राजीव बड़े हो रहे थे उनके अंदर मार्शल आर्ट्स को लेकर एक अलग ही दीवानगी पैदा हो रही थी और वह ब्रूस ली के बहुत बड़े प्रशंसक बन चुके थे। उनके पिता ने किसी तरह पैसे बचाकर अपने बेटे को ताइक्वांडो की आगे की ट्रेनिंग के लिए थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक भेजने का फैसला किया ताकि राजीव अपने हुनर को निखार सकें। बैंकॉक पहुंचना राजीव के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था लेकिन वहां की असल जिंदगी उनकी कल्पना से कई गुना ज्यादा कठोर और चुनौतीपूर्ण साबित होने वाली थी।

बैंकॉक में रहने और अपनी ट्रेनिंग का खर्च उठाने के लिए राजीव को कोई ना कोई काम करना ही था क्योंकि घर से आने वाले पैसे वहां के खर्चे के लिए नाकाफी थे। यहीं से उनके जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ जब उन्होंने एक छोटे से थाई रेस्टोरेंट में शेफ और वेटर की नौकरी करना शुरू कर दिया जहां उन्हें दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। उस समय वह सिर्फ एक आम प्रवासी मजदूर की तरह थे जो दिन में कठिन शारीरिक प्रशिक्षण लेते थे और रात को दूसरों के झूठे बर्तन धोकर अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते थे।

बैंकॉक की उस छोटी सी कोठरी में पलते हुए करोड़ों के सपने

अक्षय कुमार ने कई बार पुराने साक्षात्कारों और आप की अदालत जैसे मंचों पर बताया है कि बैंकॉक में वह एक बेहद छोटे से कमरे में रहते थे जिसका किराया बहुत कम हुआ करता था। उस कमरे की दीवारों पर उन्होंने सिल्वेस्टर स्टेलोन, ब्रूस ली और जैकी चैन जैसे हॉलीवुड एक्शन सितारों के बड़े-बड़े पोस्टर लगा रखे थे जिन्हें देखकर वह खुद को प्रेरित किया करते थे। जब भी वह रेस्टोरेंट से थक हार कर लौटते थे तो उन पोस्टर्स को देखकर उन्हें यह एहसास होता था कि उनकी मंजिल इस छोटी सी कोठरी से बहुत आगे है।

रेस्टोरेंट में काम करते हुए उन्होंने ना सिर्फ स्वादिष्ट थाई खाना बनाना सीखा बल्कि वहां आने वाले अलग-अलग लोगों के व्यवहार और उनकी जिंदगी को भी करीब से समझा। कई बार ऐसा भी होता था कि ग्राहकों के खराब बर्ताव के कारण उन्हें अपमान भी सहना पड़ता था लेकिन राजीव ने कभी अपनी किस्मत को नहीं कोसा और चुपचाप अपना काम करते रहे। यही वह दौर था जिसने उनके अंदर उस अनुशासन और धैर्य को जन्म दिया जो आज भी बॉलीवुड के इस खिलाड़ी कुमार की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।

ढाका और दिल्ली की ठोकरें तथा मुंबई में एक नई शुरुआत

बैंकॉक से अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब राजीव वापस लौटे तो सफलता की राह इतनी आसान नहीं थी और उन्हें कई अन्य जगहों पर भी किस्मत आजमानी पड़ी। उन्होंने कुछ समय के लिए बांग्लादेश के ढाका शहर में एक ट्रैवल एजेंसी में काम किया और फिर दिल्ली आकर कुंदन के गहनों का व्यापार भी करने की कोशिश की लेकिन कहीं भी उनका मन नहीं लगा। आखिरकार उन्होंने यह तय किया कि उन्हें वापस मुंबई जाना चाहिए और वहां के युवाओं को मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग देकर अपना गुजारा करना चाहिए।

मुंबई आकर उन्होंने एक छोटी सी मार्शल आर्ट्स क्लास शुरू की जहां वह बच्चों और युवाओं को फाइटिंग की बारीकियां सिखाते थे और इसी से उन्हें महीने के कुछ हजार रुपये मिल जाया करते थे। उनकी क्लास में आने वाले एक छात्र के पिता एक मशहूर फोटोग्राफर थे और उन्होंने ही राजीव को पहली बार यह सुझाव दिया कि उनकी कद-काठी और चेहरा मॉडलिंग के लिए एकदम सही है। यहीं से राजीव के मन में एक बार फिर कैमरे के सामने आने और उस सुनहरी दुनिया का हिस्सा बनने की इच्छा जागृत हुई जो उन्होंने बचपन में देखी थी।

वो एक छूटी हुई फ्लाइट जिसने हमेशा के लिए बदल दी किस्मत की लकीरें

राजीव ने मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा और उन्हें कुछ छोटे-मोटे असाइनमेंट मिलने भी लगे थे जिससे उनकी आमदनी उनके मार्शल आर्ट्स क्लास से कहीं ज्यादा हो गई थी। एक दिन उन्हें एक बहुत बड़े विज्ञापन की शूटिंग के लिए बैंगलोर जाना था जिसके लिए उन्हें सुबह जल्दी उठकर फ्लाइट पकड़नी थी लेकिन यहां किस्मत ने अपना एक अलग ही खेल खेला। राजीव को लगा कि उनकी फ्लाइट शाम की है लेकिन जब सुबह उन्हें प्रोडक्शन हाउस से फोन आया तो पता चला कि फ्लाइट सुबह की थी और वह छूट चुकी है।

यह पल उनके लिए किसी बुरे सपने जैसा था क्योंकि वह अपने काम को लेकर बहुत अनुशासित थे और इस गलती के कारण उन्हें उस प्रोजेक्ट से हाथ धोना पड़ा था। दुखी और निराश होकर राजीव उस दिन मुंबई की सड़कों पर यूं ही भटक रहे थे कि अचानक उनके कदम नटराज स्टूडियो की तरफ मुड़ गए जहां उन्होंने अपना पोर्टफोलियो दिखाने का फैसला किया। स्टूडियो में उनकी मुलाकात जाने-माने फिल्म निर्माता प्रमोद चक्रवर्ती से हुई जिन्हें राजीव की तस्वीरें इतनी पसंद आईं कि उन्होंने उसी दिन उन्हें अपनी फिल्म के लिए साइन कर लिया और उन्हें एक बड़ा चेक भी दे दिया।

राजीव भाटिया का अक्षय कुमार बनना और पहली फिल्म का सफर

प्रमोद चक्रवर्ती के उस पहले चेक ने राजीव को यह एहसास दिला दिया था कि अब उनकी जिंदगी उस दिशा में मुड़ चुकी है जिसका उन्होंने हमेशा से सपना देखा था। इसी दौरान उन्होंने अपना नाम राजीव भाटिया से बदलकर अक्षय कुमार रख लिया जो उनकी पहली फिल्म ‘आज’ के एक किरदार का नाम था जिसमें उन्होंने चंद सेकंड का कैमियो किया था। इसके बाद आई फिल्म ‘सौगंध’ से उन्होंने बतौर मुख्य अभिनेता बॉलीवुड में अपना कदम रखा लेकिन उन्हें असली पहचान फिल्म ‘खिलाड़ी’ से मिली जिसने उन्हें रातों-रात एक नया एक्शन स्टार बना दिया।

अक्षय कुमार का वो दौर ऐसा था जब बॉलीवुड में रोमांटिक हीरो का चलन था लेकिन अक्षय ने अपनी शानदार फिजीक और खतरनाक स्टंट्स के जरिए दर्शकों के दिलों में अपनी एक अलग जगह बना ली। उन्होंने अपनी फिल्मों में ऐसे खतरनाक स्टंट खुद किए जिन्हें देखकर लोगों की सांसें थम जाती थीं और जल्द ही पूरा देश उन्हें बॉलीवुड के असली खिलाड़ी के रूप में पहचानने लगा। बैंकॉक की सड़कों पर पसीना बहाने वाला वह लड़का अब भारत के हर सिनेमाघर के पोस्टर पर चमक रहा था और उसकी हर एक फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही थी।

खिलाड़ी कुमार की जिंदगी के वो अनसुने पन्ने जो आपको हैरान कर देंगे

अक्षय कुमार की जिंदगी किसी रहस्यमयी किताब की तरह है जिसके कई पन्ने आज भी आम लोगों की नजरों से दूर हैं और उनके बारे में जानना हर किसी के लिए बेहद दिलचस्प है। आप की अदालत और कई अन्य साक्षात्कारों में उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े ऐसे कई राज खोले हैं जो उनके संघर्ष और उनकी सोच को गहराई से दर्शाते हैं।

  • बैंकॉक के उसी रेस्टोरेंट में काम करते हुए अक्षय कुमार ने पहली बार महिलाओं को सम्मान देना और उनकी सुरक्षा करना सीखा था जो उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया
  • जब उन्होंने मार्शल आर्ट्स सिखाना शुरू किया था तो उनकी महीने की कमाई सिर्फ पांच हजार रुपये थी लेकिन आज वह एक फिल्म के लिए करोड़ों रुपये की फीस लेते हैं
  • अक्षय कुमार आज भी सुबह चार बजे उठते हैं और उनका यह रूटीन पिछले तीस सालों से वैसा ही है जैसा उनके संघर्ष के दिनों में हुआ करता था
  • फिल्म मोहरा के सुपरहिट होने के बाद भी अक्षय कुमार ने कभी अपने स्टारडम को अपने सिर पर हावी नहीं होने दिया और हमेशा अपने निर्देशकों के लिए एक समर्पित अभिनेता बने रहे
  • उन्होंने बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने के लिए कभी किसी गॉडफादर का सहारा नहीं लिया बल्कि अपनी मेहनत और अपने स्टंट्स के दम पर खुद को साबित किया

सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद चौदह फ्लॉप फिल्मों का वो भयानक दौर

किसी भी सुपरस्टार की जिंदगी में हमेशा सब कुछ अच्छा ही नहीं होता और अक्षय कुमार के करियर में भी एक ऐसा दौर आया जिसने उन्हें पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया था। नब्बे के दशक के अंत में एक समय ऐसा आया जब उनकी एक के बाद एक लगातार चौदह फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हो गईं और आलोचकों ने उनके करियर को खत्म मान लिया था। यह वह समय था जब बड़े-बड़े निर्माताओं ने उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी थी और उन्हें लगने लगा था कि शायद उनका फिल्मी सफर अब यहीं पर समाप्त हो जाएगा।

लेकिन बैंकॉक में बर्तन धोने वाले उस लड़के ने कभी हार मानना नहीं सीखा था और उसने इस मुश्किल वक्त में भी अपने काम पर ध्यान केंद्रित रखा। अक्षय ने अपनी गलती समझी और सिर्फ एक्शन फिल्मों तक सीमित रहने के बजाय अपनी छवि को बदलने का फैसला किया और कॉमेडी के क्षेत्र में कदम रखा। फिल्म ‘हेरा फेरी’ ने उनके करियर को एक ऐसी नई जान दी कि उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को अपना दीवाना बना लिया।

बॉलीवुड का सबसे बड़ा सुपरस्टार और एक ऐसी प्रेरणा जो कभी खत्म नहीं होगी

आज अक्षय कुमार भारतीय सिनेमा के उन गिने-चुने सितारों में से एक हैं जिनकी साल में चार से पांच फिल्में रिलीज होती हैं और वह बॉक्स ऑफिस के सबसे भरोसेमंद नाम माने जाते हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर आपके अंदर अनुशासन है और आप अपने काम के प्रति ईमानदार हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती। उनकी फिल्में ना सिर्फ मनोरंजन करती हैं बल्कि समाज को एक गहरा संदेश भी देती हैं और पैडमैन या टॉयलेट एक प्रेम कथा जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने सामाजिक मुद्दों को भी मजबूती से उठाया है।

उनकी यह यात्रा सिर्फ एक अभिनेता की सफलता की कहानी नहीं है बल्कि यह हर उस युवा के लिए एक जीती जागती प्रेरणा है जो अपनी परिस्थितियों से लड़कर कुछ बड़ा हासिल करना चाहता है। अक्षय कुमार ने यह दिखा दिया है कि इंसान के सपने उसकी औकात से बड़े हो सकते हैं और अगर वह ठान ले तो आसमान से तारे भी तोड़ कर ला सकता है। आज जब वह करोड़ों की गाड़ियों में सफर करते हैं तो भी वह यह कभी नहीं भूलते कि उनके जीवन की पहली कमाई सिर्फ कुछ सौ रुपये थी जो उन्होंने बैंकॉक में पसीना बहाकर कमाई थी।

सड़कों पर बर्तन धोने से लेकर करोड़ों दिलों पर राज करने का वो जादुई सफर

जब हम अक्षय कुमार के इस पूरे सफर को मुड़कर देखते हैं तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता क्योंकि एक ऐसा लड़का जिसका इस फिल्म इंडस्ट्री में कोई नहीं था उसने अपने दम पर एक पूरा साम्राज्य खड़ा कर दिया। बैंकॉक की वो तंग और गर्म रसोई शायद आज भी वैसी ही होगी लेकिन वहां काम करने वाले उस नौजवान ने अपनी किस्मत की इबारत अपने ही हाथों से दोबारा लिख दी। यह कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी आपको कितनी भी बार नीचे गिराए अगर आप हर बार उठकर खड़े होने का हौसला रखते हैं तो जीत आपकी ही होगी।

राजीव भाटिया से अक्षय कुमार बनने का यह सफर इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि मेहनत और लगन के आगे किस्मत को भी एक ना एक दिन झुकना ही पड़ता है। जब तक भारतीय सिनेमा का इतिहास रहेगा तब तक खिलाड़ी कुमार की यह दास्तान आने वाली कई पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि शुरुआत चाहे कितनी भी छोटी क्यों ना हो लेकिन उसका अंत एक शानदार जीत के साथ किया जा सकता है। यह सिर्फ एक अभिनेता की कहानी नहीं है बल्कि यह हर उस हार ना मानने वाले इंसान के जज्बे को एक बहुत बड़ा सलाम है जो सपनों को हकीकत में बदलने की ताकत रखता है।

Sanket Kala

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