वो दौर जब एक इंटरव्यू ने पूरे सिनेमा जगत में तूफान ला दिया था
साल 2005 का वो समय जब इंटरनेट और सोशल मीडिया का शोर आज जितना नहीं हुआ करता था। लोग सुबह उठकर अखबार के पन्नों और फिल्मी पत्रिकाओं में अपने चहेते सितारों की खबरें ढूंढा करते थे। उसी साल सिनेमाघरों में एक ऐसी फिल्म रिलीज हुई जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘ब्लैक‘ ने भावनाओं का एक ऐसा समंदर खड़ा किया था जिसमें हर दर्शक डूब जाना चाहता था। अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी के बेमिसाल अभिनय को देखकर लोग सिनेमाघरों में रो पड़े थे।
हर तरफ बस एक ही नाम गूंज रहा था और वह था ब्लैक फिल्म का जादू। ऐसा लग रहा था मानो भारतीय सिनेमा को उसकी सबसे बड़ी और महान फिल्म मिल गई हो जिसे आने वाली कई सदियों तक याद रखा जाएगा।
लेकिन इसी शान और तारीफों के बीच अचानक एक ऐसी आवाज उठी जिसने पूरे बॉलीवुड में वैचारिक भूचाल ला दिया। यह आवाज किसी आम समीक्षक की नहीं बल्कि बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान की थी जिन्होंने सीधे तौर पर इस मास्टरपीस पर सवाल खड़े कर दिए थे।
यह कहानी सिर्फ दो बड़े कलाकारों के बीच के आपसी टकराव की नहीं है। यह कहानी सिनेमा को देखने और समझने के दो बिल्कुल अलग नजरियों की है। जब आमिर खान ने ब्लैक में अमिताभ बच्चन के अभिनय को जरूरत से ज्यादा या ओवर द टॉप कहा तो यह सिर्फ एक आम बयान नहीं था। यह उस दौर की सबसे बड़ी बहस बन गया था जिसने अभिनय की परिभाषाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया था। इस लेख में हम उसी ऐतिहासिक विवाद के हर उस पन्ने को पलटेंगे जो समय की धूल में कहीं छिप गए हैं और जानेंगे कि आखिर कैमरे के पीछे की वो कड़वी सच्चाई क्या थी।
जब संजय लीला भंसाली की ब्लैक ने बॉक्स ऑफिस पर जादू किया
एक ऐसी फिल्म जिसने भारतीय सिनेमा के मायने बदल दिए
फरवरी दो हजार पांच में जब ब्लैक परदे पर आई तो उसने हिंदी सिनेमा के सारे पुराने नियमों को तोड़ दिया था। इस फिल्म में ना तो कोई गानें थे और ना ही कोई पारंपरिक नाच-गाना जो उस वक्त की फिल्मों की जान हुआ करते थे।
भंसाली ने एक अंधी और बहरी लड़की मिशेल और उसके अक्खड़ लेकिन समर्पित शिक्षक देबराज सहाय की कहानी को इतनी खूबसूरती से परदे पर उतारा कि हर कोई सन्न रह गया। फिल्म के डार्क और गहरे रंग एक अलग ही दुनिया का निर्माण कर रहे थे।
दर्शकों से लेकर बड़े-बड़े फिल्म समीक्षकों ने इसे एक मास्टरपीस करार दिया। अमिताभ बच्चन के उस भारी-भरकम और नाटकीय अभिनय को उनके करियर का सबसे बेहतरीन काम माना जाने लगा।
रानी मुखर्जी ने बिना एक शब्द बोले अपनी आंखों और इशारों से जो जादू किया था उसने उन्हें रातों-रात अभिनय की नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया था। पूरे देश में ब्लैक की सफलता के जश्न मनाए जा रहे थे और पुरस्कार समारोहों में इस फिल्म ने सारे अवॉर्ड अपने नाम कर लिए थे।
और फिर आया वो बयान जिसने पूरे बॉलीवुड को हिलाकर रख दिया
परफेक्शनिस्ट का वो खुला और बेबाक विरोध
जब हर कोई ब्लैक की तारीफों के पुल बांध रहा था तब आमिर खान अपनी फिल्म मंगल पांडे की रिलीज की तैयारियों में व्यस्त थे। उसी दौरान एक मशहूर मैगजीन को दिए गए एक इंटरव्यू में आमिर से ब्लैक फिल्म के बारे में उनकी राय पूछी गई।
सभी को लगा था कि आमिर भी बाकी लोगों की तरह फिल्म की तारीफ ही करेंगे लेकिन उनका जवाब सुनकर मीडिया जगत में सन्नाटा छा गया। आमिर ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें ब्लैक बिल्कुल भी पसंद नहीं आई और उन्हें यह फिल्म असंवेदनशील लगी।
आमिर का मानना था कि जिस तरह से फिल्म में विकलांगता को दिखाया गया है वह हकीकत से बहुत दूर है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि फिल्म के मुख्य किरदार जिस तरह से व्यवहार करते हैं वह एक आम इंसान के गले नहीं उतरता।
सबसे बड़ा धमाका तब हुआ जब आमिर ने अमिताभ बच्चन के अभिनय पर टिप्पणी करते हुए उसे ओवर द टॉप यानी जरूरत से ज्यादा नाटकीय बता दिया। उनका तर्क था कि एक शिक्षक जो खुद इतनी गहरी समझ रखता हो वह इस तरह से चीख-चिल्लाकर या हिंसक तरीके से किसी को नहीं पढ़ा सकता।
सदी के महानायक का वो शांत लेकिन तीखा जवाब
शब्दों का वो खेल जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा
आमिर खान के इस सीधे और तीखे हमले के बाद मीडिया ने अमिताभ बच्चन की प्रतिक्रिया जानने के लिए उन्हें घेर लिया। हर कोई यह देखना चाहता था कि सदी के महानायक इस तीखी आलोचना का क्या जवाब देते हैं।
अमिताभ बच्चन जो अपने शांत और शालीन स्वभाव के लिए जाने जाते हैं उन्होंने गुस्से में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने शब्दों का एक ऐसा बाण छोड़ा जिसने उनके और आमिर के बीच के वैचारिक मतभेद को और गहरा कर दिया।
अमिताभ ने एक इंटरव्यू में मुस्कुराते हुए कहा कि आमिर खान एक बहुत बड़े और बेहतरीन अभिनेता हैं और शायद उन्हें सिनेमा की समझ उनसे कहीं ज्यादा है। उन्होंने बहुत ही विनम्रता से तंज कसते हुए कहा कि हो सकता है उनका अभिनय सच में खराब हो लेकिन उनके निर्देशक संजय लीला भंसाली उनसे यही करवाना चाहते थे।
अमिताभ ने आगे यह भी जोड़ दिया कि अगर फिल्म इतनी ही असंवेदनशील और खराब थी तो दर्शकों ने उसे इतना प्यार क्यों दिया। उन्होंने आमिर की फिल्म लगान का जिक्र करते हुए कहा कि वह एक बेहतरीन फिल्म थी लेकिन हर फिल्म का दायरा और उसे पेश करने का तरीका अलग होता है।
पांच मुख्य कारण जिनकी वजह से यह विवाद ऐतिहासिक बन गया
इस पूरी घटना ने मीडिया और दर्शकों के बीच एक लंबी बहस छेड़ दी थी जिसके कुछ मुख्य पहलू इस प्रकार हैं
- विचारों की स्वतंत्रता: यह पहली बार था जब किसी बड़े सुपरस्टार ने दूसरे बड़े सुपरस्टार की फिल्म की इतनी खुलकर और सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी।
- अभिनय की दो शैलियां: आमिर खान जहां मेथड एक्टिंग और यथार्थवाद में विश्वास रखते हैं वहीं अमिताभ का अभिनय उस फिल्म में ज्यादा नाटकीय और थिएटर के करीब था।
- मीडिया का रोल: उस दौर के प्रिंट और टेलीविजन मीडिया ने इस विवाद को हफ्तों तक सुर्खियों में बनाए रखा और इसे दो दिग्गजों की जंग का नाम दे दिया।
- निर्देशकों का बचाव: संजय लीला भंसाली ने भी अमिताभ बच्चन का बचाव करते हुए कहा था कि हर फिल्म मेकर का अपना एक सिनेमाई नजरिया होता है जिसे सबको समझना चाहिए।
- कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं: इस पूरे विवाद की सबसे खास बात यह थी कि यह किसी निजी दुश्मनी पर आधारित नहीं था बल्कि पूरी तरह से सिनेमाई कला और उसके प्रदर्शन पर केंद्रित था।
जब दो अलग-अलग विचारधाराएं आपस में टकराती हैं
कला के मूल्यांकन का कोई एक पैमाना नहीं होता
इस विवाद ने भारतीय सिनेमा के छात्रों और समीक्षकों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। क्या सिनेमा में यथार्थवाद ही सब कुछ है या फिर कल्पना और नाटक की भी अपनी एक अहम जगह होती है।
आमिर खान जो हर सीन को वास्तविक बनाने के लिए महीनों मेहनत करते हैं उनके लिए ब्लैक की नाटकीयता हजम करना मुश्किल था। उनके लिए सिनेमा समाज का वो आईना है जिसे बिल्कुल साफ और स्पष्ट होना चाहिए।
दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन और संजय लीला भंसाली का सिनेमा एक ऐसी दुनिया बनाता है जो हकीकत से थोड़ी बड़ी और ज्यादा रंगीन होती है। ब्लैक का देबराज सहाय कोई आम शिक्षक नहीं था बल्कि वह एक ऐसा किरदार था जो अपनी ही निराशाओं और कुंठाओं से लड़ रहा था।
उसकी चीख और उसका गुस्सा दरअसल समाज के उस अंधेरे के खिलाफ था जिसमें मिशेल जी रही थी। यही कारण है कि अमिताभ बच्चन का वह लाउड अभिनय उस खास कहानी और उस खास माहौल के लिए बिल्कुल सटीक बैठता था।
सालों बाद वो मिलाप जब दोनों दिग्गज एक साथ परदे पर आए
ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के सेट की वो अनकही और खूबसूरत कहानी
समय के साथ मीडिया का ध्यान दूसरी खबरों पर चला गया और यह विवाद भी पुरानी फाइलों में दब गया। लोगों को लगने लगा था कि शायद अब ये दोनों दिग्गज कभी एक साथ काम नहीं करेंगे।
लेकिन सिनेमा की दुनिया भी बहुत अजीब है क्योंकि यहां कोई भी मतभेद हमेशा के लिए नहीं होता। साल दो हजार अठारह में जब फिल्म ठग्स ऑफ हिंदोस्तान की घोषणा हुई तो पूरी दुनिया यह देखकर हैरान रह गई कि आमिर और अमिताभ पहली बार एक साथ स्क्रीन साझा करने जा रहे हैं।
इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान आमिर खान बिल्कुल एक फैनबॉय की तरह नजर आए। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार किया कि वह अमिताभ बच्चन के कितने बड़े प्रशंसक हैं और उनके साथ काम करना उनके लिए किसी बड़े सपने के सच होने जैसा है।
अमिताभ ने भी आमिर के समर्पण और उनके काम करने के तरीके की जमकर तारीफ की। यह देखकर साफ हो गया था कि सालों पहले जो कुछ भी हुआ वह सिर्फ एक फिल्म को लेकर दो अलग विचार थे ना कि दिलों की कोई कड़वाहट।
सिनेमा के इतिहास में इस विवाद की असली और स्थायी जगह
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो समझ आता है कि यह विवाद भारतीय सिनेमा के लिए कितना जरूरी था। एक स्वस्थ उद्योग वही होता है जहां बड़े से बड़े लोग भी एक दूसरे के काम की आलोचना कर सकें और उसे व्यक्तिगत अपमान ना माना जाए।
आमिर खान ने यह साबित किया कि वह अपनी राय रखने से कभी नहीं डरते चाहे सामने कोई भी खड़ा हो। उन्होंने अपनी बेबाकी से यह संदेश दिया कि कला के क्षेत्र में किसी भी चीज को संपूर्ण मान लेना कला की मौत के समान है।
वहीं दूसरी ओर अमिताभ बच्चन ने अपने जवाब से यह दिखा दिया कि एक सच्चा कलाकार अपनी आलोचना को किस तरह शालीनता से स्वीकार कर सकता है और अपने निर्देशक के प्रति अपनी वफादारी निभा सकता है।
ब्लैक आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है और उसे उस दौर की सबसे बड़ी क्लासिक माना जाता है। इस विवाद ने ब्लैक फिल्म की चमक को कम करने के बजाय उसे और भी ज्यादा ऐतिहासिक और यादगार बना दिया।
कैमरे के पीछे की वो सच्चाई जो समय के साथ कभी धुंधली नहीं पड़ती
अंत में यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि सिनेमा सिर्फ एक पर्दा नहीं है बल्कि यह विचारों का एक बहुत बड़ा युद्ध का मैदान भी है। एक कलाकार जब अपने किरदार को जीता है तो वह अपनी पूरी जिंदगी का अनुभव उसमें डाल देता है।
आमिर और अमिताभ का यह वैचारिक मतभेद हमें यह सिखाता है कि हम एक ही तस्वीर को दो अलग-अलग नजरियों से देख सकते हैं और दोनों नजरिए अपनी जगह बिल्कुल सही हो सकते हैं। ब्लैक फिल्म का वो काला रंग किसी के लिए अंधकार हो सकता है तो किसी के लिए वह उम्मीद की एक नई किरण हो सकती है।
यही सिनेमा की असली खूबसूरती है कि यह कभी खत्म नहीं होता और न ही इस पर चर्चाएं कभी पुरानी होती हैं। यह हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहता है अपनी उसी पुरानी भव्यता और अपनी उसी जादुई कशिश के साथ जो हमें बार-बार सिनेमाघरों की तरफ खींच ले जाती है।










