थ्री इडियट्स का राजू रस्तोगी क्या शरमन जोशी की जगह संजय दत्त करने वाले थे यह रोल जानें अनसुने किस्से

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3 Idiots Raju Rastogi casting truth Sharman Joshi and Sanjay Dutt untold story

भारतीय सिनेमा के पन्नों में जब भी सबसे बेहतरीन और यादगार फिल्मों का जिक्र होता है तो राजकुमार हिरानी की थ्री इडियट्स का नाम हमेशा सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म ने ना सिर्फ बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे बल्कि दर्शकों के दिलों में एक ऐसी जगह बनाई जो आज तक पूरी तरह से कायम है। इस फिल्म के तीन मुख्य किरदार रणछोड़दास छांछड़ फरहान कुरैशी और राजू रस्तोगी आज भी हर युवा की कहानी को बड़ी ही गहराई के साथ बयां करते हैं।

लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी अफवाह और मिथक हमेशा से फिल्म जगत के गलियारों में गूंजता रहा है जिसने दर्शकों और आलोचकों दोनों को बरसों से हैरत में डाल रखा है। वह अफवाह यह है कि क्या राजू रस्तोगी का वह आइकॉनिक और बेहद डरा हुआ किरदार असल में शरमन जोशी की जगह बॉलीवुड के ‘खलनायक’ यानी संजय दत्त निभाने वाले थे। यह सवाल आज भी कई सिने प्रेमियों के मन में एक बड़ी उलझन पैदा करता है।

यह लेख सिर्फ एक फिल्म की कास्टिंग की कोई आम कहानी नहीं है बल्कि यह सिनेमाई इतिहास के उस पन्ने की गहराई से की गई पड़ताल है जो आज भी एक रहस्य बना हुआ है। इस विस्तृत लेख में हम राजकुमार हिरानी की दुविधा शरमन जोशी के गुमनाम संघर्ष और उस ऐतिहासिक कास्टिंग प्रक्रिया के हर अनछुए पहलू को उजागर करेंगे जिसने राजू रस्तोगी के किरदार को हमेशा के लिए अमर बना दिया।

मुन्नाभाई चले अमेरिका का डिब्बा बंद होना और थ्री इडियट्स का जन्म

इस पूरी कास्टिंग की पहेली को समझने के लिए हमें थोड़ा और पीछे समय में जाना होगा जब लगे रहो मुन्नाभाई की शानदार सफलता के बाद राजकुमार हिरानी अपने अगले प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहे थे। उस वक्त हिरानी और निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने मुन्नाभाई सीरीज की तीसरी फिल्म मुन्नाभाई चले अमेरिका की घोषणा कर दी थी और उसका एक छोटा सा टीजर भी दर्शकों के सामने बड़े पर्दे पर पेश कर दिया गया था।

संजय दत्त और अरशद वारसी उस फिल्म की शूटिंग शुरू करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे लेकिन पटकथा के स्तर पर कुछ ऐसी तकनीकी और रचनात्मक अड़चनें आईं कि हिरानी को उस प्रोजेक्ट को बीच में ही रोकना पड़ा। इसी खाली समय के दौरान हिरानी के हाथ मशहूर लेखक चेतन भगत की किताब फाइव पॉइंट समवन लगी और उन्होंने उस किताब पर आधारित एक नई कहानी बुनने का एक बेहद साहसिक फैसला कर लिया।

चूंकि मुन्नाभाई चले अमेरिका डिब्बाबंद हो गई थी इसलिए हिरानी दिल से चाहते थे कि उनके सबसे पसंदीदा अभिनेता संजय दत्त इस नई फिल्म का हिस्सा किसी ना किसी रूप में जरूर बनें ताकि उनका पुराना साथ ना छूटे। यही वह दौर था जब फिल्म के गलियारों में यह गपशप शुरू हुई कि संजय दत्त को इस इंजीनियरिंग कॉलेज की कहानी में राजू रस्तोगी या किसी अन्य बड़े किरदार के लिए सेट किया जा सकता है।

राजकुमार हिरानी की गहरी दुविधा और संजय दत्त का वो भारी व्यक्तित्व

थ्री इडियट्स के निर्माण के समय तक हिरानी और संजय दत्त का रिश्ता सिर्फ एक निर्देशक और अभिनेता का नहीं बल्कि दो बेहद करीबी दोस्तों का बन चुका था जो एक दूसरे के काम को भली-भांति समझते थे। इसी वजह से हिरानी अपनी हर फिल्म में संजय दत्त की मौजूदगी को अपने लिए एक लकी चार्म मानते थे और उन्हें अपनी इस नई दुनिया में शामिल करने के लिए कई तरह के विचारों पर मंथन कर रहे थे।

जब थ्री इडियट्स की पटकथा पूरी तरह से लिखी जा रही थी तब हिरानी के मन में यह बात साफ थी कि वह अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट में संजय दत्त को कोई मजबूत जगह देना चाहते हैं। शुरुआत में कई किरदारों के लिए संजय दत्त के नाम पर विचार किया गया क्योंकि निर्माता भी मुन्नाभाई की उस भारी सफलता को इस नई और ताजी कहानी में भुनाना चाहते थे।

यहीं से यह अफवाह उड़नी शुरू हुई कि शायद संजय दत्त को राजू रस्तोगी जैसा कोई अहम किरदार सौंपा जा सकता है ताकि फिल्म को एक बहुत बड़ा स्टारडम मिल सके। मीडिया में भी कई तरह की खबरें आने लगीं कि इस फिल्म में मुख्य भूमिकाओं के लिए ऐसे दिग्गजों की तलाश हो रही है जो बॉक्स ऑफिस पर पहले दिन से ही भारी भीड़ खींचने की ताकत रखते हों।

क्या सच में संजय दत्त बनने वाले थे राजू रस्तोगी

आइए अब इस सबसे बड़े मिथक की असलियत पर से पूरी तरह से पर्दा उठाते हैं और कास्टिंग की उस जटिल प्रक्रिया को समझते हैं जो स्टूडियो के बंद दरवाजों के पीछे चल रही थी। राजू रस्तोगी का किरदार एक ऐसे मध्यमवर्गीय लड़के का था जो अपने परिवार की बड़ी जिम्मेदारियों के बोझ तले इतना दबा हुआ था कि उसके मन में हर वक्त अपने भविष्य का एक गहरा खौफ बसा रहता था।

संजय दत्त की पर्सनैलिटी उनका भारी-भरकम शरीर और उनकी लार्जर देन लाइफ वाली स्थापित छवि राजू रस्तोगी के इस डरे हुए और सहमे हुए कॉलेज छात्र वाले किरदार से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती थी। हिरानी को राजू के किरदार के लिए एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जिसकी आंखों में एक ही वक्त पर बेबसी दर्द और एक अजीब सी मासूमियत तीनों एक साथ बहुत ही साफ-साफ दिखाई दे सकें।

असलियत यह थी कि संजय दत्त को राजू रस्तोगी का रोल कभी भी आधिकारिक तौर पर ऑफर नहीं किया गया था बल्कि यह सिर्फ एक विचार था जो उम्र और किरदार की मांग को देखते हुए तुरंत ही खारिज कर दिया गया। हालांकि हिरानी ने संजय दत्त को इस फिल्म में एक और बेहद अहम कैमियो के लिए जरूर सोचा था लेकिन वह योजना भी आगे चलकर किसी कारणवश पूरी नहीं हो सकी और यह सिर्फ एक अफवाह बनकर रह गई।

शरमन जोशी का वो लंबा संघर्ष और गुमनामी के दिन

राजू रस्तोगी के किरदार के लिए संजय दत्त का अध्याय तो बंद हो गया लेकिन सही अभिनेता की तलाश अब भी जारी थी और यहीं से फिल्म की कहानी में एंट्री होती है प्रतिभाशाली शरमन जोशी की। शरमन जोशी एक ऐसे अभिनेता थे जो गुजराती थिएटर के एक बहुत ही प्रतिष्ठित और दिग्गज परिवार से ताल्लुक रखते थे लेकिन बॉलीवुड की इस चकाचौंध में अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बनाने के लिए वह सालों से कड़ा संघर्ष कर रहे थे।

गॉडमदर से अपने करियर की शुरुआत करने वाले शरमन ने स्टाइल और एक्सक्यूज मी जैसी शानदार फिल्मों से दर्शकों को खूब हंसाया था लेकिन फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें सिर्फ एक कॉमेडी साइडकिक के तौर पर ही हमेशा के लिए टाइपकास्ट कर दिया था। उनके भीतर एक बेहद गंभीर और उम्दा कलाकार छिपा था जो किसी ऐसे पारखी निर्देशक की राह देख रहा था जो उनकी असली क्षमता को पहचान कर उसे बड़े पर्दे पर पूरी तरह से निखार सके।

रंग दे बसंती में सुखी का किरदार निभाकर शरमन ने यह साबित कर दिया था कि वह सिर्फ हंसाना ही नहीं बल्कि अपने गंभीर अभिनय से दर्शकों को रुलाना भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। इसके बावजूद उन्हें वह मुकाम और वह बड़ा स्टारडम नहीं मिल पा रहा था जिसके वह असल में हकदार थे और उन्हें अपने उस एक बड़े ब्रेक का बेसब्री से इंतजार था जो उनकी किस्मत की लकीरों को हमेशा के लिए बदल दे।

वो एक ऑडिशन जिसने रातों-रात पलट दी किस्मत की बाजी

जब थ्री इडियट्स के लिए कास्टिंग का काम जोरों पर शुरू हुआ तो राजकुमार हिरानी ने रंग दे बसंती में शरमन के शानदार काम को याद किया और उन्हें बिना किसी देरी के ऑडिशन के लिए बुलाने का फैसला किया। राजू रस्तोगी के किरदार के लिए ऑडिशन देना कोई आसान काम बिल्कुल नहीं था क्योंकि इसमें कॉमेडी के साथ-साथ एक बहुत ही गहरे डिप्रेशन और सुसाइडल टेंडेंसी को भी पर्दे पर बहुत ही सच्चाई के साथ जीना था।

शरमन ने जब ऑडिशन के दौरान राजू के उस खास और भावुक दृश्य को परफॉर्म किया जहां वह अपने खौफ और अपनी अनगिनत मजबूरियों के बारे में बात करता है तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें पूरी तरह से नम हो गईं। हिरानी उसी पल समझ गए थे कि राजू रस्तोगी का वह गहरा डर वह लड़खड़ाहट और वह मध्यमवर्गीय बेबसी शरमन जोशी से बेहतर कोई और अभिनेता पर्दे पर कभी उतार ही नहीं सकता था।

यह वह सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था जिसने शरमन के करियर की दिशा हमेशा के लिए बदल दी और उन्हें वह ऐतिहासिक भूमिका मिल गई जिसे आज पूरी दुनिया राजू रस्तोगी के नाम से जानती है। इस रोल ने यह साबित कर दिया कि सही समय पर सही किरदार मिलना किसी भी प्रतिभाशाली और संघर्षरत अभिनेता की जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे अहम मोड़ हो सकता है।

आमिर खान और आर माधवन के साथ शरमन की वो बेजोड़ केमिस्ट्री

थ्री इडियट्स की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ इसकी बेहतरीन कहानी नहीं थी बल्कि उन तीन दोस्तों की वह जादुई केमिस्ट्री थी जिसने सभी दर्शकों को अपने कॉलेज के पुराने और सुनहरे दिनों की याद दिला दी थी। आमिर खान और आर माधवन जैसे स्थापित दिग्गजों के साथ स्क्रीन साझा करना किसी भी युवा अभिनेता के लिए बहुत भारी दबाव का काम हो सकता था लेकिन शरमन ने इसे एक बड़े अवसर की तरह लिया।

रंग दे बसंती में आमिर खान के साथ काम करने का उनका पुराना अनुभव यहां उनके बहुत काम आया और कैमरे के सामने उनकी दोस्ती बिल्कुल स्वाभाविक और बिना किसी बाहरी मिलावट के नजर आई। तीनों अभिनेताओं ने सेट पर इतना लंबा समय साथ बिताया कि उनकी वह ऑफ स्क्रीन मस्ती और वह आपसी तालमेल ऑन स्क्रीन भी बहुत साफ झलकता था जिसने राजू के किरदार को और भी ज्यादा मजबूत बना दिया।

राजू रस्तोगी का किरदार इन दोनों के बीच एक ऐसे अहम पुल का काम करता था जो एक तरफ रणछोड़दास की उस विद्रोही सोच को दर्शाता था और दूसरी तरफ फरहान के उस खामोश संघर्ष को भी बहुत अच्छे से बैलेंस करता था। अगर शरमन की जगह कोई और अभिनेता होता तो शायद इन तीनों की उस प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक तिगड़ी का वह परफेक्ट बैलेंस कभी बन ही नहीं पाता जिसे आज हम पर्दे पर देखते हैं।

राजू रस्तोगी के किरदार से जुड़ी 5 दिलचस्प और अनसुनी बातें

चलिए अब आपको राजू रस्तोगी के इस अमर किरदार के निर्माण और फिल्म की शूटिंग के दौरान की उन दिलचस्प बातों से रूबरू कराते हैं जिन्हें शायद ही किसी सिने प्रेमी ने पहले कभी सुना हो। नीचे दिए गए ये चंद बिंदु इस बात का बहुत बड़ा प्रमाण हैं कि इस किरदार को पर्दे पर जीवंत बनाने के लिए पर्दे के पीछे कितनी ज्यादा मेहनत की गई थी

  • ब्लैक एंड व्हाइट दुनिया का अनूठा विचार राजू के घर के दृश्यों को जानबूझकर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के पुराने दौर जैसा शूट किया गया था ताकि उसकी गरीबी और उसके परिवार के पिछड़ेपन को एक कॉमिक लेकिन बहुत ही दर्दनाक तरीके से दर्शाया जा सके
  • शराब वाले दृश्य की वो असली सच्चाई वायरस के घर के बाहर गालियां देने वाले दृश्य में वह लड़खड़ाहट लाने के लिए शरमन ने वास्तव में शराब पी थी ताकि उनका वह शराबी अभिनय बिल्कुल प्राकृतिक और एकदम सच्चा लगे
  • अंगूठियों में छिपा खौफ का मनोविज्ञान राजू के हाथों की उंगलियों में जो अनगिनत अंगूठियां दिखाई गई थीं वह सिर्फ एक दिखावा नहीं था बल्कि वह भारतीय मध्यमवर्गीय युवाओं के मन में बैठे भविष्य के उस गहरे डर का सबसे सटीक प्रतीक थीं
  • व्हीलचेयर के दृश्यों की वह शारीरिक पीड़ा सुसाइड के प्रयास के बाद व्हीलचेयर वाले दृश्यों को शूट करना शरमन के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूपों में बहुत ज्यादा थका देने वाला और एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण अनुभव रहा था
  • इंटरव्यू का वह ऐतिहासिक और जादुई टेक फिल्म के अंत में राजू के जॉब इंटरव्यू वाला दृश्य इतने शानदार और सच्चे तरीके से शूट किया गया था कि उसने हर उस युवा की आंखों में आंसू ला दिए थे जो अपनी जिंदगी में असफलता के डर से लड़ रहा था

अस्पताल का वो भावुक दृश्य जिसने बदल दी सिनेमा की परिभाषा

फिल्म के सबसे प्रभावशाली और यादगार हिस्सों में से एक वह दृश्य था जब सुसाइड के प्रयास के बाद राजू अस्पताल में कोमा में चला जाता है और उसके दोनों दोस्त उसे होश में लाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। इस पूरे सीक्वेंस को शूट करना पूरी टीम के लिए एक बहुत ही भारी और भावुक कर देने वाला अनुभव था क्योंकि इसमें कॉमेडी और गहरे दुख का एक बहुत ही अजीब सा और सटीक मिश्रण था।

शरमन जोशी को उस बिस्तर पर बिना हिले-डुले और सिर्फ अपनी आंखों के इशारों से अपने जज्बात जाहिर करने थे जो अभिनय की दुनिया में सबसे कठिन चुनौतियों में से एक माना जाता है। जब फरहान और रैंचो उसे उसकी मां की साड़ी और बहन की शादी की अजीबोगरीब बातों से ब्लैकमेल करते हैं तो वहां पर शरमन का वह खामोश अभिनय हजारों शब्दों से भी कहीं ज्यादा असरदार था।

इस एक दृश्य ने सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों को हंसाते-हंसाते रुला दिया था और यही वह ऐतिहासिक पल था जब राजू रस्तोगी का किरदार हर दर्शक के दिल की गहराइयों में हमेशा के लिए उतर गया था। इस दृश्य की अपार सफलता का पूरा श्रेय राजकुमार हिरानी के कुशल निर्देशन और शरमन जोशी की उस बेमिसाल कला को जाता है जिसने उस असहनीय दर्द को इतनी खूबसूरती से परदे पर उकेरा।

विवाद और चुनौतियां जब फिल्म और किरदार को लेकर उठे थे गंभीर सवाल

थ्री इडियट्स की अपार सफलता के इस सुनहरे सफर में सब कुछ उतना आसान और सीधा नहीं था जितना बड़े पर्दे पर दिखाई देता है क्योंकि इस फिल्म ने अपने साथ कई बड़े विवादों को भी जन्म दिया था। चेतन भगत के नॉवेल फाइव पॉइंट समवन की क्रेडिट कंट्रोवर्सी ने मीडिया में एक बहुत बड़ा भूचाल ला दिया था जिसमें यह लंबी बहस छिड़ गई थी कि इस कहानी का असली हकदार आखिर कौन है।

राजू रस्तोगी के किरदार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि एक छात्र द्वारा आत्महत्या के प्रयास को सिनेमा के पर्दे पर बहुत ही जिम्मेदारी और गहरी संवेदनशीलता के साथ कैसे दिखाया जाए। राजकुमार हिरानी और शरमन जोशी दोनों इस बात को लेकर बेहद सतर्क थे कि यह दृश्य किसी भी रूप में आत्महत्या को बढ़ावा देने वाला बिल्कुल ना लगे बल्कि शिक्षा व्यवस्था की क्रूरता पर एक बहुत ही गहरी चोट करे।

शरमन ने इस मानसिक चुनौती को बहुत ही परिपक्वता के साथ संभाला और अपने बेहतरीन अभिनय के जरिए उस दर्द को इस तरह से पेश किया कि दर्शक उससे डरने की बजाय उससे एक बहुत ही गहरी सहानुभूति महसूस करने लगे। यही वजह थी कि विवादों के बावजूद इस फिल्म और इस खास किरदार को देश भर के दर्शकों का बेशुमार और बिल्कुल बिना शर्त प्यार मिला।

भारतीय सिनेमा के इतिहास पर राजू रस्तोगी की अमिट छाप

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें यह एहसास होता है कि राजू रस्तोगी सिर्फ किसी फिल्म का एक आम किरदार नहीं था बल्कि वह भारत के लाखों करोड़ों छात्रों की एक जीती जागती आवाज बन गया था। यह एक ऐसा किरदार था जिसने सबको यह सिखाया कि डर के साथ जिंदगी जीने से बेहतर है कि अपने उस डर का डटकर सामना किया जाए और अपनी कमजोरियों को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया जाए।

शायद अगर कोई दूसरा बड़ा सुपरस्टार या संजय दत्त जैसा कोई भारी भरकम नाम इस भूमिका को निभाता तो इस किरदार की वह मासूमियत और वह आम आदमी वाली छवि कहीं ना कहीं पूरी तरह से दब कर रह जाती। शरमन जोशी ने अपने सादगी भरे अंदाज से राजू को एक ऐसी सच्चाई दी जिसके साथ आज भी हर इंजीनियरिंग का छात्र खुद को बड़ी ही आसानी से और बिना किसी झिझक के जोड़ सकता है।

इस किरदार की असली विरासत इस बात में भी निहित है कि इसने भारतीय सिनेमा में मानसिक स्वास्थ्य और छात्रों पर पड़ने वाले पारिवारिक दबाव जैसे बेहद संवेदनशील और अछूते विषयों पर एक खुली और बहुत ही जरूरी बहस शुरू कर दी थी। राजू रस्तोगी हमेशा के लिए भारतीय सिनेमाई इतिहास में एक ऐसे मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है जिसे आने वाले कई दशकों तक कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

खौफ की बेड़ियों से उड़ान तक एक अभिनेता की अमर और प्रेरणादायक यात्रा

कहानी के इस अंतिम पड़ाव पर आकर यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि कला की इस जादुई दुनिया में जो होता है वह हमेशा किसी ना किसी अच्छे और बहुत बड़े कारण के लिए ही होता है। संजय दत्त के थ्री इडियट्स में शामिल होने की वह पुरानी अफवाह भले ही आज एक भूली बिसरी बात बन गई हो लेकिन उसने हमें कास्टिंग की उस जटिल दुनिया को समझने का एक बेहतरीन नजरिया जरूर दिया है।

शरमन जोशी ने अपने अथक संघर्ष अपने पसीने और अपनी बेजोड़ प्रतिभा से राजू रस्तोगी के उस डरे हुए खोल से निकलकर जो शानदार उड़ान भरी है वह हर संघर्षरत इंसान के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक महान किरदार सिर्फ एक बड़े नाम से नहीं बल्कि एक सच्ची लगन और एक बिल्कुल ईमानदार परफॉर्मेंस से पैदा होता है जो सीधे लोगों के दिलों को छूता है।

क्या आप भी अपनी जिंदगी में कभी राजू रस्तोगी की तरह किसी खौफ या दबाव से गुजरे हैं और क्या आपको भी अपने उस डर से बाहर निकलने का रास्ता मिला है। इस लेख को अपने उन दोस्तों और परिवार वालों के साथ जरूर साझा करें जो आज भी जिंदगी के उस खौफ से लड़ रहे हैं और जिन्हें राजू रस्तोगी की इस अमर और सच्ची कहानी से एक नई और मजबूत हिम्मत मिल सकती है।

Sanket Kala

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