चक दे इंडिया की अनकही कहानी जब शाहरुख खान नहीं जॉन अब्राहम बनने वाले थे कबीर खान

|
Facebook
चक दे इंडिया कास्टिंग अनकही कहानी

साल 2007 के उस सुनहरे दौर की कल्पना कीजिए जब भारतीय सिनेमाघरों में केवल भव्य प्रेम कहानियों और पारिवारिक ड्रामा फिल्मों का ही एकछत्र राज हुआ करता था। यश राज फिल्म्स का नाम सुनते ही दर्शकों के जेहन में स्विट्जरलैंड की बर्फीली वादियां शिफॉन की लहराती साड़ियां और मेलोडियस प्रेम गीत ही सबसे पहले आते थे। उस समय एक ऐसी फिल्म की रूपरेखा तैयार की जा रही थी जिसने इस पूरे बने बनाए सांचे को हमेशा के लिए तोड़कर रख दिया और भारतीय सिनेमा की दिशा बदल दी।

इस विचाराधीन फिल्म में न तो कोई मुख्य अभिनेत्री थी और न ही खूबसूरत वादियों में पेड़ों के इर्द गिर्द गाए जाने वाले कोई रूमानी गीत थे। यह केवल भारत की महिला हॉकी टीम के जमीनी संघर्ष और उनके उस सख्त कोच की कहानी थी जिसे पूरे देश ने बिना किसी सुबूत के गद्दार मान लिया था। इस संवेदनशील कहानी को बड़े पर्दे पर उतारना उस समय किसी बहुत बड़े और अकल्पनीय व्यावसायिक जोखिम से कम नहीं था जिसे उठाने की हिम्मत बहुत कम फिल्म निर्माताओं में थी।

फिल्म के निर्देशक शिमित अमीन और प्रतिभाशाली लेखक जयदीप साहनी अपनी इस अद्वितीय कहानी के लिए एक ऐसे नायक की तलाश में थे जो एक अनुशासित कोच की भूमिका को पूरी तरह जीवंत कर सके। आपको यह जानकर शायद बेहद हैरानी होगी कि कबीर खान के उस अमर और ऐतिहासिक किरदार के लिए बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान मेकर्स की पहली पसंद कभी थे ही नहीं। इस यादगार भूमिका के लिए जिस पहले अभिनेता के नाम पर मुहर लगने वाली थी वह कोई और नहीं बल्कि अपनी बेहतरीन फिटनेस के लिए मशहूर जॉन अब्राहम थे।

बॉलीवुड के विशाल इतिहास में कास्टिंग की ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं जो अगर सच हो जातीं तो शायद आज सिनेमा का पूरा इतिहास ही कुछ और होता। आज हम इस विशेष लेख में उसी अनकही और भूली बिसरी कहानी के पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे कि आखिर कैसे एक एक्शन हीरो के लिए लिखी गई भूमिका रोमांस के बादशाह के पास चली गई। हम गहराई से यह भी समझेंगे कि जॉन अब्राहम के इस फिल्म से बाहर होने के पीछे असल में क्या कारण थे और कैसे शाहरुख खान ने कबीर खान बनकर भारतीय सिनेमा में एक ऐसा मील का पत्थर गाड़ दिया जिसे आज भी कोई नहीं छू सका है।

रोमांस के सबसे बड़े स्टूडियो में एक यथार्थवादी स्पोर्ट्स ड्रामा का जन्म

यश राज फिल्म्स को हमेशा से उनकी उन शानदार पारिवारिक फिल्मों के लिए जाना जाता रहा है जो दशकों से भारतीय दर्शकों के दिलों पर राज करती आ रही थीं। ऐसे में एक ऐसी यथार्थवादी कहानी पर दांव लगाना जो पूरी तरह से खेल राजनीति और देशभक्ति पर आधारित हो अपने आप में एक बहुत बड़ा और साहसिक कदम माना जा रहा था। इस पूरी कहानी की असल शुरुआत तब हुई जब लेखक जयदीप साहनी ने एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार के कोने में छपी भारतीय महिला हॉकी टीम की एक छोटी सी खबर पढ़ी।

वह खबर साल दो हजार दो के राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला टीम द्वारा जीते गए ऐतिहासिक स्वर्ण पदक के बारे में थी जिसे मीडिया और पूरे देश ने पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया था। जयदीप को देश का यह उदासीन रवैया अंदर तक झकझोर गया और उन्हें लगा कि इस गंभीर विषय पर एक पूरी फिल्म बननी चाहिए ताकि इन गुमनाम नायिकाओं के कड़े संघर्ष को दुनिया के सामने लाया जा सके। उन्होंने इस अद्भुत विचार को स्टूडियो के प्रमुख आदित्य चोपड़ा के सामने रखा और आदित्य ने बिना किसी झिझक के इस कहानी की गहराई और इसके छिपे हुए भावनात्मक पहलू को तुरंत समझ लिया।

इसके बाद निर्देशन की कमान शिमित अमीन को सौंपी गई जो अपनी अब तक छप्पन जैसी डार्क और बेहतरीन यथार्थवादी फिल्मों के लिए बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे। शिमित और जयदीप ने मिलकर एक ऐसी पटकथा तैयार की जो केवल एक खेल या हॉकी के मैदान के बारे में नहीं थी बल्कि समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति पर एक कड़ा प्रहार थी। यह कहानी खेल संघों की अंदरूनी राजनीति और एक ऐसे कलंकित खिलाड़ी के आत्मसम्मान की व्यक्तिगत लड़ाई की कहानी थी जो अपने माथे से गद्दार का दाग मिटाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था।

कबीर खान के सख्त किरदार के लिए जॉन अब्राहम थे पहली और स्वाभाविक पसंद

जब इस स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म की बेहद मजबूत स्क्रिप्ट पूरी तरह से बनकर तैयार हो गई तो सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि उस सख्त और अनुशासन प्रिय कोच कबीर खान की भूमिका किसे सौंपी जाए। उस समय बॉलीवुड में जॉन अब्राहम अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म धूम की अपार सफलता के बाद युवाओं के बीच एक बहुत बड़े एक्शन और फिटनेस आइकन बन चुके थे। उनकी बेहद मजबूत शारीरिक बनावट और खेलों के प्रति उनका स्वाभाविक व्यक्तिगत झुकाव उन्हें इस चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए एकदम सटीक और स्वाभाविक विकल्प बना रहा था।

शिमित अमीन और आदित्य चोपड़ा का उस समय यह दृढ़ मानना था कि जॉन अब्राहम एक हॉकी खिलाड़ी और राष्ट्रीय कोच के रूप में बड़े पर्दे पर बेहद प्रामाणिक और विश्वसनीय नजर आएंगे। जॉन खुद भी वास्तविक जीवन में फुटबॉल और अन्य खेलों के बहुत बड़े मुरीद रहे हैं और उनके अंदर वह स्वाभाविक आक्रामकता थी जो कबीर खान के किरदार की सबसे मूल आवश्यकता मानी जा रही थी। शुरुआती दौर की कई लंबी बैठकों में इस बात पर लगभग पूरी सहमति बन चुकी थी कि जॉन ही इस फिल्म का नेतृत्व करेंगे और यह निश्चित रूप से उनके करियर की सबसे अलग फिल्म होगी।

यश राज फिल्म्स के साथ धूम जैसी बहुत बड़ी हिट फिल्म में काम करने के बाद जॉन का इस प्रोडक्शन हाउस के साथ एक बहुत ही अच्छा और पारिवारिक रिश्ता भी बन चुका था। सभी को यही लग रहा था कि यह फिल्म जॉन अब्राहम की उस स्थापित छवि को पूरी तरह से बदल देगी जो केवल एक माचो मैन या एक्शन हीरो तक ही सीमित होकर रह गई थी। कास्टिंग की यह प्रक्रिया लगभग अपने अंतिम चरण में थी और ऐसा लग रहा था कि दर्शक जल्द ही जॉन को एक हॉकी स्टिक के साथ मैदान पर कड़क निर्देश देते हुए देखेंगे।

कास्टिंग में आया बड़ा बदलाव और जॉन अब्राहम का इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट से अलग होना

सिनेमा की इस मायावी दुनिया में अक्सर ऐसा होता है कि जो चीजें शुरुआत में कागज पर बहुत अच्छी और आसान लगती हैं वह हकीकत में कई तरह की व्यावहारिक और तकनीकी चुनौतियों का शिकार हो जाती हैं। जॉन अब्राहम के साथ भी कास्टिंग के दौरान कुछ ऐसा ही हुआ क्योंकि उस समय वह अपने करियर के सबसे व्यस्त और सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे थे। उनके पास बाबुल और काबुल एक्सप्रेस जैसे कई अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स की लंबी कतार लगी हुई थी जिनके लिए वह पहले ही अपनी सारी तारीखें निर्माताओं को दे चुके थे।

इस विशेष स्पोर्ट्स फिल्म के लिए एक बहुत लंबे और बेहद समर्पित शूटिंग शेड्यूल की आवश्यकता थी जिसमें मुख्य कलाकार को कई हफ्तों तक मैदान पर असली खिलाड़ियों की तरह पसीना बहाना था। मीडिया रिपोर्ट्स और शिमित अमीन के कई पुराने साक्षात्कारों की मानें तो जॉन अब्राहम अपनी तारीखों का प्रबंधन किसी भी तरह से नहीं कर पा रहे थे और यह फिल्म के लिए एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया था। एक ही समय में कई अलग अलग फिल्मों की शूटिंग करना इस फिल्म की यथार्थवादी शैली के साथ कभी न्याय नहीं कर पाता इसलिए दोनों पक्षों को आपसी सहमति से एक कड़ा फैसला लेना पड़ा।

इसके अलावा सिनेमाई गलियारों में यह भी कहा जाता है कि यश राज फिल्म्स को बाद में यह गहराई से महसूस हुआ कि इस जोखिम भरी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर चलाने के लिए एक बहुत बड़े सुपरस्टार की दरकार होगी। सोलह बिल्कुल नई लड़कियों के साथ एक बिना रोमांस वाली सूखी फिल्म को सफल बनाने के लिए केवल एक अच्छी कहानी ही काफी नहीं थी बल्कि एक बड़े सहारे की जरूरत थी। स्टूडियो को एक ऐसा विश्वसनीय और बहुत बड़ा चेहरा चाहिए था जो केवल अपने स्टारडम के दम पर आम दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने की अद्भुत क्षमता रखता हो।

दिलचस्प बात यह भी है कि ठीक उसी दौर में जॉन अब्राहम ने धन धना धन गोल नामक एक और बड़ी स्पोर्ट्स फिल्म साइन की थी जो पूरी तरह से फुटबॉल के खेल पर आधारित थी। शायद जॉन को उस समय हॉकी के मुकाबले फुटबॉल की वह कहानी अपने लिए अधिक उपयुक्त और व्यावसायिक रूप से थोड़ी अधिक सुरक्षित लगी थी। वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन तारीखों की भारी कमी और कुछ अन्य रचनात्मक कारणों के चलते जॉन अब्राहम हमेशा के लिए इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट से अलग हो गए।

बॉलीवुड के बादशाह का कबीर खान के रूप में अकल्पनीय और ऐतिहासिक प्रवेश

जब जॉन अब्राहम के साथ बात पूरी तरह से बिगड़ गई तो मेकर्स की नजर एक ऐसे सुपरस्टार पर गई जो उस समय भारत में रोमांस का सबसे बड़ा और इकलौता पर्याय माना जाता था। शाहरुख खान को इस डिग्लेमराइज्ड और बेहद सूखी भूमिका की पेशकश करना अपने आप में मेकर्स की तरफ से एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित जोखिम था। भारतीय दर्शकों ने उन्हें अब तक हमेशा अपनी बाहें फैलाकर प्यार का इजहार करते हुए या फिर विदेशों की खूबसूरत सड़कों पर अपनी हिरोइन के साथ गाते हुए ही देखा था।

जब शाहरुख ने इस मार्मिक कहानी का नरेशन सुना तो वह इसके गहरे भावनात्मक जुड़ाव और कबीर खान के अंदर छिपे हुए दर्द से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत इसके लिए अपनी हामी भर दी। शाहरुख का अपने स्कूल के दिनों में दिल्ली में फील्ड हॉकी खेलने का एक बहुत लंबा और गहरा अनुभव रहा था जो इस किरदार को जीवंत करने में उनके लिए एक बहुत बड़ी ताकत बना। उन्हें बहुत अच्छी तरह से पता था कि एक असली खिलाड़ी मैदान पर कैसे चलता है कैसे हॉकी स्टिक पकड़ता है और हारने के बाद एक सच्चे खिलाड़ी के दिल में कैसा दर्द उठता है।

शाहरुख खान के लिए भी यह एक ऐसा सुनहरा मौका था जहां वह अपनी स्थापित रोमांटिक छवि की मजबूत बेड़ियों को तोड़कर एक अत्यंत गंभीर और यथार्थवादी अभिनेता के रूप में खुद को साबित कर सकते थे। उन्होंने इस जटिल किरदार में पूरी तरह से ढलने के लिए अपना पूरा हुलिया ही बदल लिया और चेहरे पर हल्की दाढ़ी के साथ एक बेहद गंभीर और शांत लुक अपनाया। शाहरुख ने अपनी भारी भरकम स्टार पावर को पूरी तरह से किनारे रख दिया और एक साधारण कोच की तरह उन सोलह नई लड़कियों के साथ मिलकर इस फिल्म को एक टीम की तरह जिया।

चक दे इंडिया की कास्टिंग और निर्माण से जुड़े कुछ बेहद अनसुने सच

इस महान फिल्म के निर्माण और इसकी चुनौतीपूर्ण कास्टिंग की कहानी अपने आप में इतनी ज्यादा दिलचस्प है कि इससे जुड़े कई ऐसे अनोखे पहलू हैं जो आज भी आम दर्शकों की नजरों से पूरी तरह छिपे हुए हैं। आइए विस्तार से नजर डालते हैं ऐसे ही कुछ बेहद रोचक और अनजान तथ्यों पर जिन्होंने इस फिल्म को एक कल्ट क्लासिक बनाने में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

  • शाहरुख खान और जॉन अब्राहम पर विचार करने से भी बहुत पहले इस फिल्म का प्रारंभिक प्रस्ताव सलमान खान को दिया गया था लेकिन उन्होंने फिल्म में वाणिज्यिक मसालों की कमी के कारण इसे साफ ठुकरा दिया था
  • शाहरुख खान को शुरुआत में यह गहराई से लगा था कि यह फिल्म व्यावसायिक रूप से बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल होगी लेकिन उन्होंने इसे केवल अपने पिता के खेल प्रेम को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए साइन किया था
  • फिल्म में नजर आने वाली सभी सोलह लड़कियों को कैमरे के सामने आने से पहले पूरे चार महीने तक पूर्व राष्ट्रीय कोच मीर रंजन नेगी की देखरेख में असली खिलाड़ियों की तरह एक थका देने वाले शिविर से गुजरना पड़ा था
  • निर्देशक शिमित अमीन ने फिल्म में किसी भी तरह के कृत्रिम ग्लैमराइजेशन से सख्त परहेज किया था और यही कारण है कि फिल्म के सभी मैच असली अंतरराष्ट्रीय हॉकी टूर्नामेंट्स की तरह ही विस्तृत रूप से शूट किए गए थे
  • संगीतकार सलीम सुलेमान द्वारा रचित फिल्म का टाइटल ट्रैक रिलीज के शुरुआती समय में बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ था लेकिन आज यह भारत के हर छोटे बड़े खेल आयोजन का आधिकारिक एंथम बन चुका है

एक ऐसी फिल्म जिसने बदल दिया भारतीय सिनेमा और महिला स्पोर्ट्स का नजरिया

जब दस अगस्त दो हजार सात को यह फिल्म भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हुई तो इसने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता के बिल्कुल नए झंडे गाड़े बल्कि भारतीय समाज पर भी एक बहुत गहरा और सकारात्मक प्रभाव डाला। इस फिल्म ने देश में महिला खेलों विशेषकर महिला हॉकी को लेकर आम लोगों की उस संकीर्ण सोच को पूरी तरह से बदल दिया जो पहले केवल क्रिकेट की दीवानगी तक ही सीमित थी। भारतीय दर्शकों ने पहली बार सिनेमाघरों में खड़े होकर पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रगान गाया और एक खेल फिल्म को इतने गहरे भावनात्मक स्तर पर महसूस किया जो इससे पहले भारतीय सिनेमा में कभी नहीं हुआ था।

शाहरुख खान के शानदार और विविधतापूर्ण करियर के लिए भी यह फिल्म एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई जिसने उनके अभिनय पर सवाल उठाने वाले हर आलोचक को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। फिल्म के अंत में बोले गए उनके सत्तर मिनट वाले मोनोलॉग को भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे बेहतरीन और प्रेरणादायक संवादों में गिना जाता है जो आज भी सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर देता है। इस फिल्म ने यह पूरी तरह से साबित कर दिया कि अगर कहानी में दम हो और उसे पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारा जाए तो उसे सफल होने के लिए किसी भी तरह के घिसे पिटे फॉर्मूले की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती।

इतिहास के पन्नों में दर्ज एक ऐसा फैसला जिसने रची सिने जगत की नई गाथा

सिनेमा की इस अनिश्चित दुनिया में अक्सर जो होता है वह किसी पूर्वनिर्धारित योजना का हिस्सा बिल्कुल नहीं होता बल्कि वक्त और बदलती परिस्थितियों का एक ऐसा अनोखा संगम होता है जो अपने आप एक नया जादू बुन देता है। अगर उस समय जॉन अब्राहम के पास अपनी तारीखें होतीं और वह कबीर खान के किरदार में ढल जाते तो शायद हम एक बहुत अच्छी स्पोर्ट्स फिल्म तो जरूर देख पाते लेकिन वह रूहानी जादू नहीं महसूस कर पाते जो शाहरुख खान ने पैदा किया। कबीर खान की ठहरी हुई आंखों में जो दर्द और अपने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने का जो जज्बा शाहरुख ने दिखाया वह शायद किसी और अभिनेता के बस की बात कभी थी ही नहीं।

आज जब भी भारतीय सिनेमा की सबसे महान सबसे प्रतिष्ठित और सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली फिल्मों की बात होती है तो चक दे इंडिया का नाम हमेशा सबसे ऊपर की कतार में बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। जॉन अब्राहम का इस फिल्म से अलग होना और शाहरुख खान का एक मसीहा बनकर इस फिल्म से जुड़ना शायद नियति का ही एक ऐसा अद्भुत खेल था जिसने भारतीय दर्शकों को सिनेमा का सबसे अनमोल और सदाबहार रत्न सौंप दिया। यह अनकही कहानी हमेशा हमें यह याद दिलाती रहेगी कि जीवन में कभी कभी जो चीजें हमसे अनजाने में छूट जाती हैं वह दरअसल किसी बहुत बड़े और ऐतिहासिक चमत्कार की एक खूबसूरत शुरुआत भर होती हैं।

Sanket Kala

CheapPlak.com में आपका स्वागत है ! मेरा मकसद है आप तक बॉलीवुड, वेब सीरीज़ और मनोरंजन की दुनिया की हर ताज़ा ख़बर और सटीक रिव्यु सबसे पहले पहुँचाना। मुझे इस क्षेत्र में पिछले 6 सालों का अनुभव है जिससे मैं एंटरटेनमेंट की हर अपडेट को आपके साथ साझा करना चाहता हूँ इन सभी नवीनतम, रोचक व अनसुने तथ्यों का जानने के लिए हमारे साथ बने रहें।

Leave a Comment